मुझे तुम से कुछ भी और न चाहिए :- अशोक दोशी
तर्ज: मुझे तुम से कुछ भी न चाहिए
मुझे कुछ भी और न चाहिए
मेरे मुल्क का विकास हो-2
मुझे कुछ भी और न चाहिए
मेरा देश ये विकास हो-2
कोई दीन हिन हो यदि कहीं
उसे भोजन और निवास दो-2
मुझे कुछ भी और न चाहिए...
दो सबको तुम ऐसी जिंदगी
शख्स हरिक यहां पर खुश रहे
दो सबको प्यारी जिंदगी
शख्स हरिक यहां पर खुश रहे
दो उनको सुरक्षित आशियां ताकि लोग यहाॅं महफुज हो
अगर कोई हासिये पे रह गया
उन्हें उचित एक मुकाम दो
मुझे कुछ भी और न चाहिए
मेरे देश का विकास हो-2
कोई दीन हिन हो यदि कहीं
उसे भोजन और निवास दो-2
मुझे कुछ भी और न चाहिए ...
वो उठाओ कदम जोभी ठोस हो
रहे न किसी को भी ग़म कोई
वे उठाओ कदम जोभी ठोस हो
रहे न किसी को भी ग़म कोई
मेरी चाहतें बस इतनी सी है
दिखलाए शासन वो दम कोई
वो कौशल जो कभी खिला नहीं
उसे तरकीब से तराश दो।
मुझे कुछ भी और न चाहिए
मेरे मुल्क का विकास हो-2
मुझे कुछ भी और न चाहिए
मेरे देश का विकास हो-2
स्वरचित:अशोक दोशी


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