मिलावट के खिलाफ जागरूकता की जरूरत :- अशोक बाफना

 


आज की तेज़ भागदौड़ वाली जिंदगी में हमने सुविधा को इतना बड़ा बना दिया है कि सेहत पीछे छूटती जा रही है, और यही बात मुझे सबसे ज्यादा चिंता में डालती है। हम समय की कमी का बहाना बनाकर बाजार का चमकदार और सस्ता सामान बिना सोचे अपनी थाली में रख लेते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि दूध में रसायन, मसालों में रंग, पनीर में मिलावट और पानीपूरी तक में गंदगी की खबरें अब आम हो चुकी हैं; अहमदाबाद सहित कई शहरों में छापों में सड़ा सामान और गंदा पानी तक मिला है, और यही खाना हमारे बच्चों के शरीर में जा रहा है, जिससे टाइफाइड, पीलिया और दूसरी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। मुझे लगता है कि केवल प्रशासन की कार्रवाई से बदलाव नहीं आएगा, जब तक हम खुद जागरूक नहीं होंगे; हमें देखना होगा कि खाना कहाँ बन रहा है, कितना साफ है, बहुत सस्ता तो नहीं है, और गड़बड़ी दिखे तो आवाज उठानी होगी। घर का सादा और ताज़ा भोजन हमारी सबसे बड़ी ताकत है, क्योंकि जैसा अन्न होगा वैसा ही मन और तन बनेगा। अब समय आ गया है कि हम सुविधा से पहले स्वास्थ्य को चुनें, स्वाद से पहले शुद्धता को महत्व दें और यह समझें कि स्वस्थ समाज की शुरुआत किसी योजना से नहीं, बल्कि हमारी अपनी थाली से होती है; सच कहूँ तो अब केवल थाली नहीं, सोच बदलने का समय है।



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