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_मेरा गांव और आम का पेड़_ :- दिनेश दोशी मंडार- चेन्नई

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  _मेरा गांव और आम का पेड़_ 🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _गर आमवृक्ष होता मेरे प्रांगण में,  खटिया लगाकर सोता उसके छावन में_ 🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _सुबह की किरणें छनकर आती पत्तों से, नींद सुनहरी उड़ जाती सपनों से_   🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _मीठे पके आमों का सबको रसपान कराता,  झूले बांध नाती पोतों को अठखेलियां करवाता_ 🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _गांव के बच्चों की महफिल  सजती पत्थर से अमिया गिराती  निशाने बाजी की धाक जमाती_ 🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _हर रोज़ आम की दावत होती घर में, काश मैं अभी  गांव में होता_ 🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _यार दोस्त संग मौज उड़ाते, साथ बैठ कुछ खट्टे  मीठे किस्से सुनाते_  🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _कुहू कुहू कोयलिया करती  मधुर कलरव से गीत गुंजन करती_ 🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _गर्म धूप से मैं बचता  छांव में बैठ कुछ काव्य, कहानी रचता_ 🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _गर आमवृक्ष होता मेरे प्रांगण में, अंतिम पड़ाव मजे से कटता_ 🥭🥭🥭🥭🥭🥭 _ ✍🏻दिनेश दोशी_

निजीकरण का नफा नुकसान - दिनेश दोशी

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जिस देश में डाकखाने(पोस्ट ऑफिस) का पार्सल 15 से 20 दिन में और कूरियर 2 दिन में आता है,एवं जिस देश में पिज्जा 30 मिनट में आता है और एम्बुलेंस 3 घण्टे में वहाँ निजीकरण ही एकमात्र समाधान है। निजीकरण (privatisation) की सबसे बड़ी बुराई यह है कि,इसमें वेतन के बदले काम करना पड़ता है। प्राइवेट नोकरी में 10से 15हजार कमानेवाले कभी हडताल पर नही जाते, लेकिन 80 से 90 हजार कमानेवाले सरकारी दामादों का पेट कभी नहीं भरता है,इसलिये बार बार हड़ताल पर जाते है,यही कारण है कि निजीकरण जरूरी है। 60 हज़ार की सरकारी सेलरी किसी एक को देने की बजह, 20-20 हज़ार के 3 कर्मचारी रखे जाये,तो काम भी जल्दी होगा और बेरोजगारी भी कम होगी,इसलिए निजीकरण जरूरी है। और लोग कह रहे है कि निजीकरण करके सरकार देश बेच रही है। ऐसा लग रहा है कि कुछ लोगों के दर्द तो पेट में है और माथा कूटा जा रहा है। अगर बेलगाम घोड़े की नकेल को बराबर ना कसा गया तो वही घोड़ा लात मारकर आपको घायल कर सकता है इसीलिए निजीकरण की लगाम को थामना बहुत ही जरूरी है _*✍🏼.........दिनेश दोशी*_