_मेरा गांव और आम का पेड़_ :- दिनेश दोशी मंडार- चेन्नई


 _मेरा गांव और आम का पेड़_

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_गर आमवृक्ष होता मेरे प्रांगण में, 

खटिया लगाकर सोता उसके छावन में_

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_सुबह की किरणें छनकर आती पत्तों से,

नींद सुनहरी उड़ जाती सपनों से_  

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_मीठे पके आमों का सबको रसपान कराता,

 झूले बांध नाती पोतों को अठखेलियां करवाता_

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_गांव के बच्चों की महफिल 

सजती पत्थर से अमिया गिराती 

निशाने बाजी की धाक जमाती_

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_हर रोज़ आम की दावत होती घर में,

काश मैं अभी  गांव में होता_

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_यार दोस्त संग मौज उड़ाते,

साथ बैठ कुछ खट्टे  मीठे किस्से सुनाते_ 

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_कुहू कुहू कोयलिया करती 

मधुर कलरव से गीत गुंजन करती_

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_गर्म धूप से मैं बचता 

छांव में बैठ कुछ काव्य, कहानी रचता_

🥭🥭🥭🥭🥭🥭

_गर आमवृक्ष होता मेरे प्रांगण में,

अंतिम पड़ाव मजे से कटता_

🥭🥭🥭🥭🥭🥭


_✍🏻दिनेश दोशी_



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