धर्म जड़ नहीं, एक प्रवाह है- आचार्य श्री उदय वल्लभ सूरीजी म.सा. का गिरधर नगर में प्रेरणादायक प्रवचन
अहमदाबाद (शाहीबाग), 14 जुलाई:
गिरधर नगर जैन संघ में आज का दिन बेहद खास और सोच बदलने वाला रहा। प्रेम भुवन भानु समुदाय के पूज्य आचार्य श्री उदय वल्लभ सूरीश्वरजी म.सा. ने अपने प्रवचन में जो बात कही, उसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने धर्म को समय की कसौटी पर परखने और बदलती ज़िंदगी के हिसाब से ढालने की बात बहुत सरल और समझदारी भरे अंदाज़ में रखी।
आचार्य श्री ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अगर हम चाहते हैं कि लोग धर्म से जुड़ें रहें, तो कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव जरूरी है। उन्होंने बताया कि अब लोगों के पास समय कम होता है, काम का बोझ ज़्यादा है। ऐसे में अगर धर्म पालन कठिन बना दिया जाए तो लोग धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। इसलिए आज ज़रूरत है कि धर्म को आसान, सुविधाजनक और समय के अनुसार बनाया जाए, ताकि आस्था भी बनी रहे और व्यस्त जीवन में भी श्रद्धा का दीपक जलता रहे।
उन्हें देखकर लग ही नहीं रहा था कि वो कोई परंपरा तोड़ने की बात कर रहे हैं, बल्कि ऐसा लग रहा था कि वे परंपरा को नई ऊर्जा देने की बात कर रहे हैं। उन्होंने समझाया कि इसी सोच के चलते ही वर्षो पहले चौविहार हाउस की व्यवस्था की शुरुवात की गई है ताकि लोग रात्रि भोजन के त्याग के नियम पालन कर सकें। प्रवचन के समय में भी बदलाव किया गया ताकि लोग अपने समय के अनुसार धर्म सुन और समझ सकें। और आयंबिल खाने की व्यवस्था भी इसी का हिस्सा है।
सबसे अहम बात तब सामने आई जब गोमतीपुर की प्राचीन चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा को नई जगह प्रतिष्ठित करने की बात आई थी उस पर आचार्य श्री ने बहुत ही भावुक बात कही
जब हम पुराने मकान से नए मकान में जाते हैं, तो क्या अपने माता-पिता को पुराने घर में छोड़ आते हैं? बिल्कुल नहीं। तो फिर भगवान को क्यों छोड़ें? जहाँ ज़्यादा श्रद्धालु हैं, जहाँ सेवा और भक्ति करने वाले लोग हैं, वहीं भगवान को प्रतिष्ठित करना धर्म की सच्ची सेवा है।
उन्होंने बताया कि अब बहुत सारे जैन परिवार नई कॉलोनियों में जाकर बस चुके हैं। पुराने मंदिरों में बहुत कम लोग जाते हैं, जबकि नई जगहों पर सैकड़ों लोग रोज़ भक्ति करना चाहते हैं। ऐसे में अगर हम प्राचीन प्रतिमा को वहां स्थापित करें, तो भगवान की सेवा भी ठीक से होगी और समाज भी ज़्यादा जुड़ पाएगा।
इस मौके पर स्वतंत्र पत्रकार दिनेश देवड़ा धोका ने जानकारी देते हुए बताया कि आचार्य श्री का यह प्रवचन सिर्फ धर्म की बात नहीं थी, यह आज की पीढ़ी को एक दिशा देने वाली बात थी।
हर बात का विरोध करना सही नहीं होता। सोचिए, अगर समय के साथ धर्म में बदलाव न हुए होते, तो आज हमारा जैन धर्म कहाँ होता? समय के साथ चलना ही धर्म की असली ताकत है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में धर्म को जीवित रखने के लिए परंपरा के साथ-साथ समझदारी और बदलाव ज़रूरी है। बदलाव का मतलब यह नहीं कि हम परंपरा को छोड़ रहे हैं, बल्कि इसका मतलब है कि हम उसे आने वाली पीढ़ी के लिए समझने लायक और अपनाने लायक बना रहे हैं।
गिरधर नगर का आज का प्रवचन दिल को छू गया। आचार्य श्री के शब्दों ने न केवल धर्म की गहराई समझाई, बल्कि यह भी सिखाया कि धर्म में अगर बहाव नहीं होगा, तो वह ठहर जाएगा और जो ठहरता है, वह धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। इसलिए धर्म को जिंदा रखना है तो समय के साथ समझदारी से कदम बढ़ाने होंगे।धर्म को महसूस करो, समझो और वक्त के साथ जोड़ो – यही आज का सबसे बड़ा संदेश था।


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