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"रिश्तों की असली ताकत" A MOTVATIONAL STORY

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  सच्ची दोस्ती की मिसाल: मुश्किल वक्त में साथ अर्जुन और विजय दो घनिष्ठ मित्र थे। उनकी दोस्ती की मिसाल दी जाती थी—हर खुशी और मुश्किल में एक-दूसरे का साथ निभाने वाले। लेकिन जैसे-जैसे ज़िंदगी की रफ्तार तेज़ हुई, रिश्ते धीमे पड़ने लगे। अर्जुन अपने करियर में व्यस्त हो गया और विजय अपनी ज़िम्मेदारियों में। बातचीत कम होने लगी, मुलाकातें भी धीरे-धीरे खत्म हो गईं। एक दिन किसी ने अर्जुन के कान भर दिए,  विजय अब तुम्हारी पीठ पीछे बातें करता है, वो पहले जैसा नहीं रहा। अर्जुन ने बिना सच जाने विजय से दूरी बना ली। व्हाट्सएप पर मैसेज आना बंद हो गए, फोन कॉल्स अनसुनी होने लगीं। विजय ने कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन के अहंकार ने उसकी आवाज़ दबा दी। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती डिजिटल दुनिया में कहीं खो गई। कुछ साल बीते। अर्जुन को एक गंभीर बीमारी हो गई। सोशल मीडिया पर हज़ारों 'Get Well Soon' के मैसेज थे, लेकिन असल में कोई उसके पास नहीं था। अस्पताल के एकांत में जब उसे सबसे ज़्यादा अपनेपन की ज़रूरत थी, तब दरवाज़ा खुला, सामने विजय खड़ा था। वो बिना कुछ कहे, बिना कोई शिकायत किए अर्जुन की देखभाल में लग...

"दर्पण में मुख और संसार में सुख" A MOTIVATIONAL STORY

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"दर्पण में मुख और संसार में सुख" A MOTIVATIONAL STOR Y दर्पण में जब हम अपना चेहरा देखते हैं, तो हमें केवल बाहरी स्वरूप दिखाई देता है मुस्कुराता हुआ चेहरा, थकी हुई आँखें, या कभी-कभी एक चमकदार व्यक्तित्व। लेकिन यह केवल एक छवि है, जो हमारे वास्तविक मनोभावों को प्रकट नहीं करती। इसी तरह, संसार में जो सुख दिखाई देता है, वह भी हमेशा वास्तविक नहीं होता। बाहरी चमक-दमक के पीछे अक्सर एक गहरी सच्चाई छिपी होती है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आसान होता है। हम अक्सर यह सोचकर भ्रम में रहते हैं कि जितना अधिक हमारे पास होगा, उतना अधिक खुशहाल जीवन होगा, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। वास्तविक जीवन में कई उदाहरण हमें यह सिखाते हैं कि बाहरी सुख हमेशा मन की शांति का कारण नहीं बनता। बड़े व्यवसायी, जिनके पास अथाह धन-दौलत है, उनके जीवन में सच्चा सुख दुर्लभ होता है। बाहर से वे सफल और खुशहाल लगते हैं, लेकिन भीतर से वे तनाव, अकेलापन और मानसिक बोझ से घिरे होते हैं। दूसरी ओर, एक साधारण किसान, जो दिनभर खेत में मेहनत करता है, जब शाम को अपने परिवार के साथ बैठता है, तो उसके चेहरे पर संतोष की चमक होती है। उसकी...

"सच्ची सेवा का मूल्य" A STORY

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प्रतिकात्मक चित्र एक नगर में परम तपस्वी जैन साधु महाराज का चातुर्मास चल रहा था। उनकी पावन वाणी से नगरवासी धर्म के प्रति जागरूक हो रहे थे। प्रतिदिन प्रवचन में साधु महाराज कहते— "सच्ची सेवा वही है, जो निःस्वार्थ भावना और समर्पण से की जाए।" नगर में एक धनवान सेठ रहता था। उसने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए चातुर्मास के दौरान भव्य भोजनशाला का आयोजन किया। प्रतिदिन सैकड़ों लोग वहाँ भोजन करते, सेठ की प्रशंसा करते और सेठ गर्व से सोचता  मुझसे बड़ा धर्मात्मा कौन? दूसरी ओर, नगर में एक गरीब युवक रहता था। वह न तो धनवान था और न ही किसी बड़े परिवार से, लेकिन उसमें परिश्रम और सेवा का भाव था। जब चातुर्मास शुरू हुआ, तो उसने देखा कि साधु महाराज के प्रवचन में आने वाले श्रद्धालुओं को बैठने में परेशानी होती है। बिना किसी को बताए, वह रोज़ सुबह मंदिर आता और सभी बैठने के स्थान की सफाई करता, फटी हुई चटाइयों की मरम्मत करता, और साधु-संघ के लिए प्रवचन स्थल को व्यवस्थित करता। गर्मी के दिनों में, वह अपने श्रम से प्रवचन स्थल पर छाया की व्यवस्था करता ताकि कोई असुविधा न हो। उसने कभी अपनी सेवा का प्रदर्शन नह...

सौम्यता, सहकार और बेदाग चरित्र—संगठन की असली शक्ति

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जैनाचार्य भगवंत अपने  प्रवचन से उपस्थित श्रोताओं को जीवन की उच्चतम शिक्षाएँ प्रदान कर रहे थे। उनकी मधुर वाणी में वह शक्ति थी, जो सुनने वालों के मन में गहरे संस्कार अंकित कर रही थी। सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति उनके मुख से निकलने वाले शब्दों को ध्यानपूर्वक सुन रहा था। तभी एक श्रावक ने विनम्रतापूर्वक प्रश्न किया गुरुदेव, जब किसी संस्था का उद्देश्य सेवा होता है, तब भी कई बार मतभेद क्यों उत्पन्न होते हैं? संगठन में एकता बनाए रखने और अपने चरित्र को उज्जवल एवं बेदाग रखने की सच्ची राह क्या है? आचार्य भगवंत ने शांत स्वर में कहा संगठन की नींव केवल सेवा नहीं होती, उसे सुदृढ़ बनाते हैं—सौम्यता, सहकार और निष्कलंक आचरण। जहाँ सौम्यता से विचारों की स्वीकृति होती है, सहकार से कार्य किए जाते हैं, और चरित्र में बेदाग पवित्रता होती है, वहीं संगठन फलता-फूलता है।" फिर उन्होंने एक प्रेरक उदाहरण दिया | बहुत समय पहले सम्यक् सेवा संघ नामक एक संस्था थी, जिसका उद्देश्य समाज में जरूरतमंदों की सहायता करना था। सभी पदाधिकारी परिश्रमी और सेवा-भाव से प्रेरित थे, किंतु उनकी सोच में भिन्नता थी। एक बार संस्थ...