सौम्यता, सहकार और बेदाग चरित्र—संगठन की असली शक्ति



जैनाचार्य भगवंत अपने  प्रवचन से उपस्थित श्रोताओं को जीवन की उच्चतम शिक्षाएँ प्रदान कर रहे थे। उनकी मधुर वाणी में वह शक्ति थी, जो सुनने वालों के मन में गहरे संस्कार अंकित कर रही थी। सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति उनके मुख से निकलने वाले शब्दों को ध्यानपूर्वक सुन रहा था। तभी एक श्रावक ने विनम्रतापूर्वक प्रश्न किया

गुरुदेव, जब किसी संस्था का उद्देश्य सेवा होता है, तब भी कई बार मतभेद क्यों उत्पन्न होते हैं? संगठन में एकता बनाए रखने और अपने चरित्र को उज्जवल एवं बेदाग रखने की सच्ची राह क्या है?

आचार्य भगवंत ने शांत स्वर में कहा

संगठन की नींव केवल सेवा नहीं होती, उसे सुदृढ़ बनाते हैं—सौम्यता, सहकार और निष्कलंक आचरण। जहाँ सौम्यता से विचारों की स्वीकृति होती है, सहकार से कार्य किए जाते हैं, और चरित्र में बेदाग पवित्रता होती है, वहीं संगठन फलता-फूलता है।"

फिर उन्होंने एक प्रेरक उदाहरण दिया |

बहुत समय पहले सम्यक् सेवा संघ नामक एक संस्था थी, जिसका उद्देश्य समाज में जरूरतमंदों की सहायता करना था। सभी पदाधिकारी परिश्रमी और सेवा-भाव से प्रेरित थे, किंतु उनकी सोच में भिन्नता थी। एक बार संस्था ने निर्धन बच्चों की शिक्षा के लिए एक अभियान शुरू किया। सचिव ने कहा कि बच्चों को पाठ्य सामग्री दी जाए, जबकि कोषाध्यक्ष ने नियमित शिक्षकों की व्यवस्था की बात कही। दोनों योजनाएँ उत्तम थीं, लेकिन अहंकार ने उनके बीच मतभेद पैदा कर दिए।

आचार्य भगवंत कुछ क्षण रुके और फिर बोले

जब स्वार्थ और अहंकार किसी संगठन में स्थान पा लेते हैं, तो सेवा का उद्देश्य धुंधला हो जाता है। सच्चा सेवक वही है, जो अपने विचारों में सौम्यता रखे, दूसरों की बातों को समझे, और अपने चरित्र को बेदाग बनाए। बिना सौम्यता के सहकार नहीं पनपता, और बिना उज्जवल चरित्र के सेवा का कोई मूल्य नहीं रहता।"

उन्होंने एक दृष्टांत प्रस्तुत किया

एक राजा ने अपने तीन मंत्रियों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें एक जलाशय में दूध भरने को कहा। रात्रि में दो मंत्रियों ने सोचा कि यदि वे पानी डालेंगे, तो कोई देख नहीं पाएगा। तीसरे मंत्री ने ईमानदारी से दूध डाला। प्रातः जब राजा ने जलाशय देखा, तो वह पानी से भरा था। राजा ने कहा— 'जिसका चरित्र बेदाग होता है, वही समाज की सच्ची सेवा कर सकता है।'"

फिर आचार्य भगवंत ने 'सम्यक् सेवा संघ' की बात  को आगे बढ़ाते हुए कहा

जब संस्था में मतभेद बढ़ने लगे, तो अध्यक्ष ने सभी को एकत्र किया। उन्होंने कहा हमारा उद्देश्य सेवा है, न कि अपने विचारों को सर्वोपरि बनाना। जब तक हम सौम्यता से एक-दूसरे की बात नहीं सुनेंगे और चरित्र को निष्कलंक नहीं रखेंगे, तब तक हमारी सेवा सार्थक नहीं होगी।

इन शब्दों ने सभी को आत्ममंथन करने पर विवश कर दिया। सचिव और कोषाध्यक्ष ने अपनी भूल स्वीकार की और मिलकर एक नई योजना बनाई। उनके सहकार और समर्पण से अभियान ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। इस संगठन की एकता और सेवा की मिसाल पूरे नगर में दी जाने लगी।

प्रवचन के अंत में आचार्य भगवंत ने सभा को संबोधित करते हुए कहा

संगठन की सफलता बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक गुणों से होती है। सौम्यता से विचारों का आदान-प्रदान सरल बनता है, सहकार से कार्य में गति आती है, और बेदाग चरित्र से समाज में विश्वास उत्पन्न होता है।

जो अपने मन के अहंकार को त्यागकर सेवा को सर्वोपरि मानता है, वही सच्चा सेवक है। संगठन की असली शक्ति व्यक्ति के चरित्र में होती है यदि वह उज्जवल और बेदाग है, तो कोई भी विघ्न सेवा-मार्ग को बाधित नहीं कर सकता।


इन शब्दों ने सभी के मन में एक नया उत्साह भर दिया। सभी ने एक स्वर में संकल्प लिया कि वे अपने संगठन में सौम्यता, सहकार और निष्कलंक आचरण को सदैव बनाए रखेंगे और आचार्य भगवंत की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाकर सच्ची सेवा करेंगे।

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