"सच्ची सेवा का मूल्य" A STORY

प्रतिकात्मक चित्र


एक नगर में परम तपस्वी जैन साधु महाराज का चातुर्मास चल रहा था। उनकी पावन वाणी से नगरवासी धर्म के प्रति जागरूक हो रहे थे। प्रतिदिन प्रवचन में साधु महाराज कहते—

"सच्ची सेवा वही है, जो निःस्वार्थ भावना और समर्पण से की जाए।"

नगर में एक धनवान सेठ रहता था। उसने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए चातुर्मास के दौरान भव्य भोजनशाला का आयोजन किया। प्रतिदिन सैकड़ों लोग वहाँ भोजन करते, सेठ की प्रशंसा करते और सेठ गर्व से सोचता मुझसे बड़ा धर्मात्मा कौन?

दूसरी ओर, नगर में एक गरीब युवक रहता था। वह न तो धनवान था और न ही किसी बड़े परिवार से, लेकिन उसमें परिश्रम और सेवा का भाव था।

जब चातुर्मास शुरू हुआ, तो उसने देखा कि साधु महाराज के प्रवचन में आने वाले श्रद्धालुओं को बैठने में परेशानी होती है। बिना किसी को बताए, वह रोज़ सुबह मंदिर आता और सभी बैठने के स्थान की सफाई करता, फटी हुई चटाइयों की मरम्मत करता, और साधु-संघ के लिए प्रवचन स्थल को व्यवस्थित करता।

गर्मी के दिनों में, वह अपने श्रम से प्रवचन स्थल पर छाया की व्यवस्था करता ताकि कोई असुविधा न हो। उसने कभी अपनी सेवा का प्रदर्शन नहीं किया और न ही किसी से प्रशंसा की अपेक्षा रखी।

जब चातुर्मास पूर्ण हुआ, तो विदाई समारोह में साधु महाराज ने नगरवासियों को संबोधित करते हुए कहा इस चातुर्मास में जिस सेवा ने मेरे हृदय को सबसे अधिक स्पर्श किया, वह न किसी धनवान ने की, न किसी विद्वान ने बल्कि एक साधारण युवक ने, जिसने बिना किसी दिखावे के सच्चे समर्पण से सेवा की। उसने श्रम और निःस्वार्थ भावना से जो कार्य किया, वह सबसे श्रेष्ठ है।

साधु महाराज की यह वाणी सुनकर सेठ आश्चर्यचकित रह गया। वह सोचने लगा मैंने तो इतना धन खर्च किया, फिर भी साधु महाराज ने इस युवक की सेवा को सर्वोत्तम क्यों माना?

साधु महाराज ने सेठ की ओर देखा और कहा

सेवा का मूल्य धन से नहीं, भावना से आँका जाता है। जिसने अपने श्रम से, पूरी श्रद्धा और समर्पण से कार्य किया, उसकी सेवा सबसे श्रेष्ठ है। सेवा में दिखावा नहीं, निःस्वार्थ प्रेम होना चाहिए। यह सुनकर सेठ की आँखों में पश्चात्ताप के आँसू आ गए। उसने उसी क्षण संकल्प लिया कि आगे से सेवा वह करेगा जिसमें न अहंकार होगा, न प्रदर्शन, केवल सच्चा समर्पण होगा।

  • सच्ची सेवा वह है जो निःस्वार्थ भावना और समर्पण से की जाए।
  • सेवा का मूल्य धन से नहीं, श्रम और श्रद्धा से आँका जाता है।
  • छोटी-सी सेवा भी महान होती है, यदि वह ईमानदारी और प्रेम से की जाए।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अहमदाबाद में श्रीमती जेठीदेवी संकलेचा का निधन, नेत्रदान कर बनीं समाज के लिए प्रेरणा

नाहटा परिवार द्वारा आयोजित "रिषभ राज संघोत्सव" का शुभ मुहूर्त प्रदान

कर्णावती यूनिवर्सिटी में गढ़सिवाना की योगिता (देविका) जैन को गोल्ड मेडल

तेरापंथ युवक परिषद, अहमदाबाद की वार्षिक सभा हुई सम्पन्न,प्रदीप बागरेचा बने नए अध्यक्ष

भाव अशुभ शुभ हो पहले POETRY

मिलावट के खिलाफ जागरूकता की जरूरत :- अशोक बाफना

अग्रवाल समाज का ऐतिहासिक प्रोजेक्ट: मदुरै स्थित तथनेरी देवभूमि (श्मशान गृह) में वेटिंग हॉल का उद्घाटन 10 मार्च को

राजभवन में हुआ PYS का 212वां सेशन — आचार्य श्री उदय वल्लभ सूरिश्वरजी म.सा. ने दी “ब्लैक बॉक्स” के ज़रिए खुद को समझने की सीख

पत्नी की याद में समर्पण की मिसाल: चूरू के व्यापारी निर्मल सेठिया ने यूके में रचा इतिहास

धर्म जड़ नहीं, एक प्रवाह है- आचार्य श्री उदय वल्लभ सूरीजी म.सा. का गिरधर नगर में प्रेरणादायक प्रवचन