निजीकरण का नफा नुकसान - दिनेश दोशी
जिस देश में डाकखाने(पोस्ट ऑफिस) का पार्सल 15 से 20 दिन में और कूरियर 2 दिन में आता है,एवं जिस देश में पिज्जा 30 मिनट में आता है और एम्बुलेंस 3 घण्टे में वहाँ निजीकरण ही एकमात्र समाधान है।
निजीकरण (privatisation) की सबसे बड़ी बुराई यह है कि,इसमें वेतन के बदले काम करना पड़ता है।
प्राइवेट नोकरी में 10से 15हजार कमानेवाले कभी हडताल पर नही जाते, लेकिन 80 से 90 हजार कमानेवाले सरकारी दामादों का पेट कभी नहीं भरता है,इसलिये बार बार हड़ताल पर जाते है,यही कारण है कि निजीकरण जरूरी है।
60 हज़ार की सरकारी सेलरी किसी एक को देने की बजह, 20-20 हज़ार के 3 कर्मचारी रखे जाये,तो काम भी जल्दी होगा और बेरोजगारी भी कम होगी,इसलिए निजीकरण जरूरी है।
और लोग कह रहे है कि निजीकरण करके सरकार देश बेच रही है।
ऐसा लग रहा है कि कुछ लोगों के दर्द तो पेट में है और माथा कूटा जा रहा है।
अगर बेलगाम घोड़े की नकेल को बराबर ना कसा गया तो वही घोड़ा लात मारकर आपको घायल कर सकता है इसीलिए निजीकरण की लगाम को थामना बहुत ही जरूरी है
_*✍🏼.........दिनेश दोशी*_

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