महंगी शादियाँ, खाली हाथ समाज- दिनेश देवड़ा धोका



आज अगर हम ईमानदारी से पूरे हालात देखें तो समझ में आता है कि शादियाँ अब खुशी और संस्कार का अवसर कम, और खर्च व दिखावे की मजबूरी ज्यादा बनती जा रही हैं। हमारे आसपास के रिसॉर्ट्स में साल भर में करीब 300 शादियाँ हो जाती हैं, जिनमें रिसॉर्ट का रेंट, इवेंट मैनेजमेंट, सजावट, लाइट-साउंड, फोटो-वीडियो और खासतौर पर खाने-पीने पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं। यहीं बात खत्म नहीं होती, इसमें मेहमानों के आने-जाने का किराया, कई दिनों का होटल खर्च और ड्रेसकोड के नाम पर हर परिवार द्वारा खरीदे गए नए कपड़े, जूते और गहने भी जोड़ दिए जाएँ तो यह रकम साल भर में लगभग 300 से 400 करोड़ रुपये तक पहुँच जाती है। यह पैसा किसी एक घर का नहीं, बल्कि पूरे समाज की मेहनत की कमाई है, जो कुछ दिनों की चकाचौंध में खत्म हो जाती है और समाज के हाथ में कोई स्थायी संपत्ति नहीं बचती।
सबसे ज्यादा सोचने वाली बात यह है कि इस दिखावे का बोझ अक्सर मध्यम वर्ग पर पड़ता है। कई परिवार सिर्फ “लोग क्या कहेंगे” के डर से कर्ज लेकर शादियाँ करते हैं, अपनी जरूरी जरूरतें टाल देते हैं और खुशी का अवसर तनाव में बदल जाता है। दूसरी तरफ यह सारा पैसा ज्यादातर रिसॉर्ट मालिकों, इवेंट कंपनियों और कैटरर्स की जेब में चला जाता है, समाज के भीतर न कोई भवन बनता है, न स्कूल, न अस्पताल और न ही साधर्मिक सहायता की कोई मजबूत व्यवस्था।
ऐसे में हमें अपने ही आसपास के अच्छे उदाहरणों से सीख लेनी चाहिए। पड़ोसी जालोर जिले के आहोर गाँव ने सादगी, सीमित मेहमान और सामूहिक विवाह की सोच अपनाकर यह साबित किया है कि कम खर्च में भी सम्मान, खुशी और संस्कार पूरे हो सकते हैं। हाल ही में हमारे क्षेत्र के एक रईस परिवार ने भी अपने पुत्र का विवाह सामूहिक रूप से आयोजित कर उसी मंच पर कई मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों का विवाह करवाकर समाज को यह संदेश दिया कि सामर्थ्य का सही अर्थ दिखावा नहीं, बल्कि समाज को साथ लेकर चलना है।
अब जरा कल्पना कीजिए, अगर हर साल शादियों में उड़ाए जाने वाले इस धन का एक हिस्सा भी अपने गाँव या समाज क्षेत्र में लगाया जाए और ए स्थायी, सर्व-सुविधायुक्त सामुदायिक भवन बनाया जाए, जहाँ शादी, धार्मिक कार्यक्रम, समाज की बैठकें और सेवा कार्य होते रहें, और साल में दो-तीन बार वहीं सामूहिक विवाह हों, तो कितने परिवारों का बोझ हल्का हो सकता है। तब शादी तुलना और प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं, बल्कि संस्कार और सहयोग का पर्व बनेगी।
यह सवाल किसी व्यक्ति या परिवार पर उंगली उठाने का नहीं है, बल्कि हम सबके मन से जुड़ा है कि आखिर सही क्या है और गलत क्या। क्या सही यह है कि हम हर साल करोड़ों रुपये कुछ दिनों की शान-शौकत में बहाते रहें, या सही यह है कि उसी धन से समाज का भविष्य मजबूत करें। फैसला आज हमारे सोचने और समझने पर निर्भर है, क्योंकि यही तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियों को हम केवल महँगी शादियों की कहानियाँ देंगे या एक मजबूत

, समझदार और संवेदनशील समाज।

*दिनेश देवड़ा धोका*


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