जब से प्रकृति से दूरी बनाई, बीमारी ने नजदीकी बढ़ाई:- दिनेश देवड़ा धोका

दिनेश देवड़ा धोका सिवाना -अहमदाबाद


पुराने जमाने में लोग सादा खाते थे, मेहनत करते थे, धूप हवा में रहते थे, इसलिए बिना बड़ी बीमारियों के जी लेते थे। दादियाँ परदादियाँ बिना किसी डिग्री के घर पर ही प्रसव करा देती थीं, पहलवान दो दिन में हड्डी जोड़ देता था, नाड़ी वैद्य एक बार नाड़ी पकड़कर बता देते थे कि शरीर में क्या गड़बड़ है और हकीम की एक छोटी सी पुड़िया कई दवाओं से ज्यादा असर कर जाती थी। इलाज सस्ता था, खाना शुद्ध था और जिंदगी में इतना तनाव नहीं था इसलिए जेब भी बचती थी और सेहत भी। आज हालात उलटे हैं। आधुनिक डॉक्टर, मशीनें और बड़े बड़े अस्पताल जरूरत पड़ने पर जान भी बचाते हैं, लेकिन हमारी जीवनशैली इतनी बिगड़ गई है कि छोटी सी परेशानी भी बड़ी बीमारी बन जाती है। जंक फूड, मिलावट, भागदौड़ और तनाव की वजह से बीमारी बढ़ रही है और इलाज का खर्च भी आसमान छू रहा है। टेस्ट, स्कैन, दवाइयाँ और ऑपरेशन सब महंगा हो गया है। अब सवाल यह नहीं कि प्राचीन तरीका सही था या आधुनिक, सवाल यह है कि आज हमारे लिए क्या ठीक है। सच तो यही है कि पुरानी जीवनशैली में सादगी थी, प्रकृति का साथ था और शरीर मजबूत रहता था। आधुनिक जीवनशैली सुविधा और सुरक्षा देती है, लेकिन तनाव भी बहुत बढ़ाती है। इसलिए समझदारी इसी में है कि दोनों का सही मेल रखा जाए। खाना साफ सुथरा और जितना हो सके देसी रखा जाए, रोज थोड़ा चलें, धूप लें, समय पर सोएँ और जरूरत पड़ने पर आधुनिक डॉक्टर और तकनीक का सहारा लें। न पूरी तरह पुराने जमाने में लौटना है और न पूरी तरह मशीनों के भरोसे जीना है। बस इतना करना है कि जिंदगी में सादगी और विज्ञान दोनों साथ चलें ताकि सेहत भी बनी रहे और खर्च भी काबू में रहे।



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