भाषा समझने का ज़रिया है, झगड़े का कारण नहीं - दिनेश देवड़ा धोका
आजकल अक्सर सुनने में आता है कि लोग भाषा को लेकर झगड़ रहे हैं। कोई कहता है हिंदी बोलो, कोई कहता है अपनी मातृभाषा बोलो, तो कोई अंग्रेज़ी को ही सही मानता है। लेकिन ज़रा सोचिए, भाषा का असली मतलब क्या है? भाषा तो सिर्फ बात समझने और समझाने का ज़रिया है। इसका काम लोगों को जोड़ना है, बाँटना नहीं।
अगर दो लोग एक-दूसरे की बात समझ पा रहे हैं, तो फिर फर्क क्या पड़ता है कि वो हिंदी में बोल रहे हैं या अंग्रेज़ी में, तमिल में या मराठी में। असली मायने तो समझ में आने के हैं, न कि शब्दों में उलझ जाने के।
मुसीबत तब होती है जब हम भाषा को अपनी पहचान या अहंकार का मुद्दा बना लेते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हर भाषा में एक संस्कृति की खुशबू होती है, एक समाज की कहानी छिपी होती है। कोई भाषा ऊँची नहीं होती, कोई नीची नहीं होती, बस सबकी अपनी-अपनी मिठास होती है।
अगर हम हर भाषा को बराबर सम्मान देना सीख लें, तो समाज में न तो दीवारें रहेंगी और न ही दूरियाँ। क्योंकि जब बात दिल से की जाती है, तो ज़ुबान का फर्क मायने नहीं रखता।
इसलिए ज़रूरत है कि हम भाषा को संवाद का सेतु बनाएं, विवाद का कारण नहीं। जिस भी भाषा में बात हो, बस एक-दूसरे को समझ में आ जाए, वही सबसे अच्छी भाषा है। आखिर बात शब्दों से नहीं, भावों से होती है।


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