. "ज़मीर की आवाज़" 🕊️ दिनेश दोशी
सच बोलने की हिम्मत, आत्मसम्मान का स्वाभिमान और झूठ के बाज़ार में ईमान की मशाल थामे रहना यही पहचान है दिनेश दोशी की लेखनी की। उनकी कलम किसी की खुशामद नहीं करती, किसी पद या पदवी के आगे नहीं झुकती।यह कविता उस विचारधारा की प्रतीक है जहाँ सच्चाई को धर्म माना गया है और आत्मगौरव को जीवन का अभिन्न अंग। हर शेर में एक आग है जो झूठ की परतें जलाकर सच्चाई की रोशनी फैलाती है। पेश है उनकी भावनाओं से सजी सशक्त कविता
बहुतों से बिगड़ पड़ी मेरी,
चमचागिरी का चस्का नहीं.
सच बोलता हूं खुलकर,
ज़हन में झूठ का मस्का नहीं.
बिक गया गर मैं दुनिया में,
फिर बाकी कुछ बचता नहीं.
मेरा जमीर ही मेरी जागीर है,
तलवे चाटना जचता नहीं.
चुप भी रहूं तो अख़बार हूं,
सस्ती शोहरत मेरी आस नहीं.
अपनी शर्तों पर जीता हूं,
किसी बैसाखी की तलाश नहीं.
जो मिला है उसमें खुश हूं,
हाथ फैलाना फितरत नहीं.
सर झुकाना अदब सही पर,
बेवजह दबना मेरी आदत नहीं.
सम्मान सबका करता हूं पर,
गुलामी की खिदमत गवारा नहीं.
ग़रूर है मुझे इस बात का,
बनावट से खुद को संवारा नहीं.
लोग समझते है कि मग़रूर हूं मैं,
पर फ़ख्र के सिवा कुछ भी नहीं.
प्यार मुहब्बत में जीता हूं,
जिद्द अकड़ में यकीन नहीं.
पता है मुझे
मेरे चाहकों की फेहरिस्त थोड़ी छोटी है,
पर इसका मुझे कोई रंज नहीं
पर जो भी है लाज़वाब है,
पर जो भी है लाज़वाब है,
इसमें कोई शक नहीं
✍🏻 दिनेश दोशी चेन्नई


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