*साहित्य_चोरी* :- कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव*
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कोई मेरी रचना तोड़ मरोड़कर,
अपने नाम कर जाता है।
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता,
कोई मेरे हिस्से का खाता है।
हाँ,दिल में दर्द जरूर होता है,
हाँ,थोड़ा गुस्सा भी होता है।
पर दिल को समझाया हूँ ऐसे,
कौनसे चोरी हो गये है पैसे।
कुछ अच्छी होगी मेरी रचना,
इसलिए ही होती है चोरी।
कौनसा उसे बेचकर उसको,
धन मिलेगा भरकर के बोरी।
क्या मिलता है तुमको करके ऐसा,
क्या दिल गवाही देता तुम्हारा।
हाथ पैर सिर तोड़ रचना का,
पोस्ट मार्टम कर देते सारा।
जिसने भी लिखी बड़े प्यार से,
हीरे-जवाहरात सोने चांदी के तार से,
वध हो रहा आँखों के सामने,
देख कितना तड़पता दिल बेचारा।
माँ सरस्वती के हो उपासक,
मत करो कभी ऐसा काम।
साहित्य साधक हो आप,
क्यों होते जग में बदनाम?
फिर भी धन्यवाद करता है मुथा,
जो करते हैं ऐसा काम।
उनकी बदौलत ही कुछ और
अच्छा लिखने का आता है ज्ञान।
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*कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव*
*मुम्बई*

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