चालों से नहीं, सोच से जीती जाती है बाज़ी:- दिनेश देवड़ा धोका

 


शतरंज दिवस पर विशेष


आज 20 जुलाई, विश्व शतरंज दिवस है। यह सिर्फ एक खेल का नहीं, बल्कि एक गहरी सोच का सम्मान करने का दिन है। शतरंज को यूं ही बुद्धिमानों का खेल नहीं कहा गया। इसमें जीतने के लिए ताकत नहीं, दिमाग चाहिए। हर मोहरे के पीछे सिर्फ चाल नहीं, एक दृष्टि होनी चाहिए। यही शतरंज आज की दुनिया में हमें समाज, संस्था और नेतृत्व की असली परिभाषा सिखाता है।
किसी भी संस्था की मिसाल अगर दी जाए, तो शतरंज का मैदान ही काफी है। राजा यानी अध्यक्ष, सचिव यानी वज़ीर, कार्यकर्ता यानी प्यादेहर एक का अपना स्थान, अपनी भूमिका। लेकिन खेल तब बिगड़ता है जब कोई मोहरा खुद को राजा समझने लगे, या राजा चुपचाप मोहरों के भरोसे रह जाए। बाज़ी तब जीती जाती है जब हर चाल सोच-समझकर चले, न भावना में, न अहंकार में।
आज देश-विदेश में सैकड़ों संगठन, ट्रस्ट, समाजसेवी संस्थाएं, सांस्कृतिक परिषदें काम कर रही हैं। लेकिन क्या सभी सच्चे अर्थों में टीम की तरह चल रहे हैं, या सिर्फ पद, प्रतिष्ठा और प्रचार की होड़ में चालें उलझती जा रही हैं?
शतरंज सिखाता है—हर प्यादा, अगर सही दिशा में बढ़े, तो वज़ीर बन सकता है। यही बात हमें उन हजारों कार्यकर्ताओं से मिलती है जो ज़मीनी स्तर से शुरू होकर आज संस्था के स्तंभ बन चुके हैं। भारत के कई नेता, सामाजिक संगठनों के अध्यक्ष, या सफल ट्रस्टी पहले कभी छोटे प्यादे ही तो थे। पर आज जो पदों पर हैं, अगर वे दूसरों को आगे बढ़ने का रास्ता नहीं देंगे, तो संस्था ठहर जाएगी और चालें खुद उलझ जाएंगी।
शतरंज की सबसे गूढ़ शिक्षा है त्याग।
कभी बाज़ी बचाने के लिए वज़ीर तक की कुर्बानी देनी पड़ती है।
और समाज में वही संस्था फलती है, जहाँ पदाधिकारी अपनी अहमियत से ज़्यादा संस्था की भलाई सोचते हैं।
जो पद पर नहीं, पथ पर विश्वास रखते हैं।
समय की कीमत भी शतरंज सिखाता है। टिक-टिक चलती घड़ी याद दिलाती है कि वक्त हर चाल का गवाह होता है। जो समय पर फैसले लेते हैं, वही आगे बढ़ते हैं। समाज सेवा में भी यही सच है। वक़्त पर उठी आवाज़ असर करती है, देर से आई सलाह सिर्फ बहस बन जाती है।
आज जब हर ओर दिखावे का शोर है फोटो खिंचवाने की होड़, सोशल मीडिया पर कर्म जताने की परंपरा तब शतरंज हमें चुपचाप, सोचकर, बिना शोर किए मात देने की कला सिखाता है।
इस विश्व शतरंज दिवस पर, सिर्फ चालें नहीं, अपना चिंतन भी दुरुस्त करें।
संस्थाओं में दिखावा नहीं, दिशा हो
पदाधिकारियों में घमंड नहीं, दायित्व हो
कार्यकर्ताओं में थकावट नहीं, उम्मीद हो
और समाज में हर कोई खुद को मोहरा नहीं, एक ज़िम्मेदार खिलाड़ी समझे
शतरंज हमें यह नहीं सिखाता कि हम जीतें, बल्कि यह सिखाता है कि हम सोचकर चलें, और जब चलें तो सिर्फ खुद के लिए नहीं, सबके हित में चलें

विश्व शतरंज दिवस की शुभकामनाएं
दिनेश देवड़ा धोका
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक


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