सावण रो विरह
बरस रह्यो है सावण ,
मोरया नाचै वृक्षडाळी,
चहु मेर छाई हरियाळी,
पण मन म्हारो है खाली.
हिन्डे पर बैठी गोरडी
नेणा जोहे घणी बाट
बलम थाकी याद सतावे
थारा बिन सूनी ख़ाट
बादळ गरजै अम्बर में,
ज्यूँ दिल में उठै घणी पीर,
पत्ता री सरसराहट भी,
ज्यूँ दिल ने देवती चीर.
कोयलडी री मीठी बोली,
विरह रो गीत सुणावै,
फूलां री भीनी खुशबू,
बिण थारे फीकी पड़ जावै.
ओ पिया सावण आयेगो,
पण तू न घर पर आयो,
थारे बिना सूनी है रातां,
ज्यूँ बिन धूप रो छायो.
थारी यादां री खुशबू,
हर सांस में समाई,
थारी बाँहां री चाहत,
हर पल मने सताई.
आ जा म्हारासांवरिया
अब और मत तड़पा रे
बिण थारे सूनो सावण
अब मत अगन बरसा रे
_✍🏻दिनेश दोशी_

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