कलम की प्यास, रचना की तलाश
पिपासु भी हूं जिज्ञासु भी हूँ
साहित्य मंथन से लगी है प्रीत
निकालता हूं शब्दों के मोती
यही मेरी कलमकारी की रीत
जब तक मंथन करता नहीं
मिलता न साहित्य नवनीत
नवनीत पिघलाकर सजाता
शिल्प से कविता की प्रीत
शायरी कविता भी नशा है
जब तक कुछ नहीं रचता
बेचैन सा रहता है मेरा दिल
अधूरी है शायर की जीत
कई लोग मुझे दीवाना कहते
पर मैं तो रहता मेरी मस्ती में
चाहे कुछ भी कहते रहे मुझे
ये उनकी अपनी अपनी रीत
नई सुबह संग लाया मनमीत,
अनुभव में गूंजता नया गीत.
यादों में लगता है मेरा चित्त,
कल्पना में घुला काव्य संगीत.
✍🏻दिनेश दोशी


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें