*युवा पीढ़ी की दिशा एवं दशा के प्रेरणा स्त्रोत- सदगुरु*

*पदमचंद गांधी*    

 


*दिशाहीनता आज के युवाओं की जिंदगी का आम सच है।  देश के बहुसंख्यक युवा इस समस्या से घिरे हुए हैं । जीवन की राहों पर उनके पांव बहक रहे हैं ,भटक रहे हैं तथा फिसलने लगे हैं । वे जो कर रहे हैं उनके अन्जाम या मंजिल का उन्हें न तो पता है और न ही इनके बारे में उन्हें सोचने की फुर्सत है। बस जिज्ञासा, कुतूहल, ख्वाहिश, शौक या फैशन के नाम पर उन्होंने टेढ़ी-मेढ़ी राहो को चुना है या फिर तनाव ,हताशा, निराशा या कुंठा ने जबरन उन्हें इन रास्तों पर धकेल दिया है। मीडिया ,सोशल मीडिया, टीवी, फिल्में ,इंटरनेट ,आसपास का माहौल उन्हें इसके लिए प्रेरित कर रहा है। सामाजिक वातावरण भी दिशाहीनता के लिए काफी कुछ हद तक जिम्मेदार है ।*


*आज युवाओं में जो नशे का जोर है उसमें शराब, सिगरेट, चरस ,गांजा, अफीम ,तंबाकू आदि को कोई जगह नहीं है यह सब तो गुजरे जमाने की ओल्ड फैशन की चीज हो चुकी है। सिगरेट, शराब तो आम सॉफ्ट आइटम कहे जाते हैं। आज का नया शगल जिसे युवा अपने तनाव को दूर करने का साधन बना रहे हैं वह है पब, नाइट क्लब, कॉफी रेस्टोरेंट, जहां उन्हें मिलता है चिल्ड वाटर एनर्जी ड्रिंक्स ,बे सिर  पैर वाली हंसी मजाक, अपने में डुबो देने वाले नया संगीत, डांस और शटरस। शटरस अर्थात नशे के जरिए ली जाने वाली हेरोइन या कोकीन ।*

 

*साइबर कैफे ,संचार माध्यम, इंटरनेट साधनों का सदुपयोग के स्थान पर  जिंदगी से भटके युवक युवतियां इनका दुरुपयोग  कर रही है । साइबर कैफे उनके जीवन में जहर घोलने की बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। वर्ष 2006 में छत्तीसगढ़ रायपुर का एक प्रकरण समाचार पत्रों में प्रचारित हुआ था जिसमें डेढ़ सौ साइबर कैफे पंजीकृत पाए गए। जहां पर समाचार संवाददाताओं और जान करो की राय में अधिकतर साइबर कैफे पहुंचने वाले युवक युवतियों  चैटिंग के बहाने पोर्न साइटों को जरूर कंगाल थे । आज का आंकड़ा कितना होगा जहा पर 24 घंटे ऐसी साइटे चलती है एक प्रश्न चिन्ह है?*


*ऐसी दिशाहीनता के लिए दोषी कौन? क्या केवल यह युवक युवतियों अथवा परिवार या समाज जहां यह चल रहे हैं या बड़े हो रहे हैं? क्या केवल युवा पीढ़ी को कोष कर अपने कर्तव्यों की  इति श्री  कर लेनी चाहिए या फिर समाज को परिवार को अपनी दायित्व निभाने के लिए कमर कसनी चाहिए । जहां तक बात अपनी है तो स्पष्ट है कि हम विचारशील कहे जाने वाले सामाजिक माहौल को प्रेरणादायक बनाने में नाकाम रहे हैं अथवा इस संबंध में कुछ किया भी है तो बहुत थोड़ा है।*

 

*आज आवश्यकता है ऐसे आध्यात्मिक सद्गुरुओं की  जिनका प्रेरक एवं सम्यक व्यक्तित्व युवाओं को सन्मार्ग एवं  सउद्देश्य के लिए चल पड़ने के लिए प्रेरित कर सके। सद्गुरु ही एक ऐसा दिशा सूचक यंत्र है जो जीवन नैया को गंतव्य स्थान तक पहुंचता है। सद्गुरु ही हमारे प्रेरणा के स्रोत रहे हैं जिन्होंने डूबते को बचाया है, गिरते हुए को उठाया है ,तथा युवाओं का जीवन संवारा है। इतिहास साक्षी है जो स्पष्ट करता है की खूंखार डाकू , क्रिमिनल, इनके शरण में आकर अपने जीवन को धन्य बनाया है । महावीर ने अर्जुन माली को संवारा , अभिमानी इंद्रभूती गौतम को परम विनीत एवं द्वादशाअंगी  बनाया । रत्नाकर डाकू को नारद जी ने वाल्मीकि बनाया, जिसने रामायण की रचना की। कुख्यात डाकू नरवीर को आचार्य  यशोभद्र सूरिजी  ने शांति का पाठ पढ़ाया जिससे उनका हृदय परिवर्तन हुआ । बुद्ध की शरण में सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद संपूर्ण साम्राज्य को धर्ममयी बनाया । परदेसी राजा का जीवन कितना अहंकारी असंस्कारी अनगढ और हिंसामयी था  केसीश्रमण  के समागम से उनका पापमयी जीवन पवित्र बन गया। राजा श्रेणिक को अनाथी मुनि द्वारा दिए गए एक शब्द अनाथ से पूरा जीवन बदल दिया। यह होता था गुरुओं का असर क्योंकि गुरु वही होता है जो  व्यक्ति के व्यक्तित्व गुणो में अभिवृद्धि कर देते हैं। आज हमें ऐसे आध्यात्मिक सद्गुरु की आवश्यकता है।*

*आज हमारे आध्यात्मिक  ही गुरु ही हमारे जीते जागते तीर्थंकर है। हमारा जीवन एक नौका के समान है जो क्रोध, मान ,माया ,लोभ ,व्यसन  कुसंगत, दुराचरण आदि चट्टानों से टकराती रहती है ।सद्गुरु  आकाशदीप बनाकर हमें सूचित करते हैं  आगाह करते हैं  -हे आत्मजनो आप इस राह पर न जाना। यदि कषायों की चट्टानों से नौका टकरा जाए तो भव-भव को बिगाड़ लेंगे ।- ऐसे गुरुदेव हमें सावधान करते हैं ,रक्षक एवं प्रहरी का कार्य करते हैं ।*


*गुरु संदेश देते हैं उतिष्ठत जागृत प्राप्य वरान्नि बोधतः अर्थात उठो जागो और रुको नहीं जब तक जीवन के लक्ष्य तक नहीं पहुंच जाओ । प्रभु महावीर ने गौतम से कहा है गौतम तू पल भर का भी प्रमाद मत कर। ऐसे गुरु की चरम गुणवत्ता झलकती हो जिसमें जिंदगी की झलक निहार सके। गुरु तो वह सांचा है जहां शिष्य को सर्वोच्च आकृति प्रदान कर देते हैं। गुरु गुलाब की तरह खिलना एवं महकना सीखते हैं ।चंदन की तरह शीतलता हमारे भीतर में भरते हैं ।हमारे भीतर मे दीपक की तरह आलौकिक भावनाओं की ज्योत जगाते हैं । गुरु कुशल कारीगर एवं कुंभकार की तरह होते हैं जो ऊपर से चोट मारते हैं भीतर से संभालते हैं तथा  कुंभ का निर्माण करते हैं। मिट्टी से बना वही कुंभ लोगों को शीतलता प्रदान करता है। सच्चा गुरु वही होता है जो स्वयं वीतरागता  को अपनाता है तथा दूसरों को सुगमता की राह दिखाता है । सच्चा गुरु वही है जो शिष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान के प्रकाश में बाहर लाता है। छोटा सा विद्यार्थी जिसके न मां न पिता न घर न जायदाद  लेकिन भीतर में गुरु की आध्यात्मिकता  दृढ़ मनोबल, विश्वास था । गरीबों की सेवा में प्यार देखा ,जिसने सेवा के लिए अपने आप को उत्सर्ग कर लिया ऐसा कागासा जापान का गोदी बन गया । चाणक्य ने चंद्रगुप्त को गुरु रामदास ने शिवजी को द्रोणाचार्य  के न चाहते हुए भी एकलव्य को गढ़ दिया । श्रीमद् भगवत गीता के अनुसार शिष्य मे ऐसी श्रद्धा जिससे गुरु वाक्य ही ब्रह्म वाक्य बन जाए ऐसी श्रद्धा का होना आवश्यक है।*


*प्रश्न उठता है कि हमारे आध्यात्मिक गुरु कैसे हो? किस तरह उन्हें पहचान जाए ? युवा पीढ़ी का एक फार्मूला है -परखो  स्वीकार करो एवं अपनाओ। जैसे स्वामी विवेकानंद   में गुरु को तलाशने की ललक थी प्यास थी तो वे ठंड के दिनों में ठंडे पानी  की नदी में कूद कर रामकृष्ण परमहंस तक पहुंच गए। ऐसी ही प्यास एवं पात्रता युवकों में जगे। सच्चा गुरु हमे न केवल जीने की कला सिखाते है वरन मरने का महोत्सव का मार्ग भी बताते है। सार्थक यौवन को महकाने के लिए ऐसे गुरु आवश्यक है जो स्वयं अपना परिशोधन कर स्वयं की अंतस चेतना जागते हुए औरों को कुंठाएं एवं कुचक्रो में फंसने न दे ।उनकी नकारात्मकता को सकारात्मक की ओर, प्रतिकूलता से अनुकूलता की ओर, तथा उलझी हुई ग्रंथियां को सुलझाने का कार्य करें।*


*आध्यात्मिक गुरु आज की आवश्यकता है ।युवा पीढ़ी को सन्मार्ग पर सद्गुरु ही ला सकते हैं। क्योंकि इनमें गुरुत्व का  आभामंडल प्रभावशाली होता है । उनके कथनी और करणी में अंतर नहीं होता ।  ऐसे गुरु युवाओं के आदर्श होते हैं जिनके जीवन में आदर्श की चरम गुणवत्ता झलकती है।*


*आज के अधिकांश युवा कागज की नाव के सहारे महासागर को पार करना चाहते हैं ।दिखावे में विश्वास करते हैं। नजर नींव की तरफ न जाकर कंगूरे की तरफ जाती है। ऐसे बाबा  गुरुओ को ढूंढने का प्रयास करते हैं जो उनके स्वार्थ की पूर्ति कर सके ।सब कुछ तैयार करके गुणवत्ता की घूंट पिला दे। जिससे सभी कार्य सिद्ध हो जाए। ऐसी मानसिकता के व्यक्ति धर्म के मर्म को नहीं जानते। गुरु की सच्ची महिमा को नहीं पहचानते। लेकिन गुरु तो स्वयं वह सांचा है जिसमें  युवा स्वयं ढाल सके एवं सवर सके। लेकिन इस सोच की पहचान सही हो, खोज पूरी हो  जो युवकों के दर्द को मिटा दे।* 

*आज के युवाओ में श्रद्धा समर्पण  एवं आस्था की कमी है । उन्हें आज ही परिणाम चाहिए कल का धीरज उनमें नहीं है। ऐसे में वे  गुरु के पास आना ही नहीं चाहते । यदि आते हैं तो नहीं के बराबर ।लेकिन गुरु में तो वह गुरुत्वाकर्षण बल होता है जो अपने प्रभाव से प्रभावित कर लेते हैं तथा आध्यात्मिकता से जागृत कर देते हैं । आध्यात्मिकता उस चीज का नाम है जो मनुष्य के जीवन में समाविष्ट हो जाती है । जीवन में जो ज्ञान व्यवहारिक धरातल पर उतारा जा सके उसका नाम है आध्यात्मिकता । आध्यात्मिकता वह  है जिसमें व्यक्ति की भावनाओं का स्तर ऊंचा उठ सके अर्थात उसका अंतरंग और उसकी मनोभावना विकसित होकर ऊपर उठसके। यदि भावनाएं ऊंची है तो व्यक्तित्व उच्च होगा । आध्यात्मिकता की कुंजी श्रद्धा है, सफलता की जननी श्रद्धा है ,श्रद्धा गुरु के प्रति होनी चाहिए। यह हमे कहां से कहां ले जाती है। इसकी महिमा अपरंपार है ।जब एक बार श्रद्धा आरोपित कर गुरु मान लिया तो किंतु परंतु नहीं होना चाहिए । जो व्यक्ति समस्त कर्मों का परमात्मा में श्रद्धा के साथ अर्पण एवं विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर लेता है वह उन्मुक्त पुरुष कभी कर्म बंधन में नहीं बंधता। वह सदैव सुखी मनपसंद स्थिति वाला रहता है तथा दिव्य कर्मी कहलाता है।*


*यदि युवा पीढ़ी के भटकाव को रोकना है, यदि वे अपने जीवन को संवारना चाहती है ,आध्यात्मिकता की राह पर चलकर अपने जीवन का कल्याण कर आत्म शांति को प्राप्त करना चाहती ,तो उन्हें सद्गुरु की शरण में आना ही पड़ेगा क्योंकि गुरु के पास ही ऐसी शक्ति है जो उनके सोए हुए चैतन्य को जागृत कर सकता है । अत: युवाओं को ऐसे गुरु की के समीप जाना चाहिए  उनसे साक्षात करना चाहिए । उनके पास हर मर्ज की दवा है, हर रोग का इलाज है । यदि आवश्यकता है तो उनके प्रति श्रद्धा समर्पण एवं आस्था की। बिगड़े हुए जीवन को या भटकते हुए जीवन को गुरु की शरण में रहकर युवा पीढ़ी संवारने का प्रयास करे।  यही गुरु पूर्णिमा का महत्व है और  शिष्य परंपरा का भी।*



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