जैन साधु-संतों में समय के अनुसार बदलाव की ज़रूरत , एक गंभीर और चिंतनीय विषय


हम सब जानते हैं कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता। मौसम बदलता है, माहौल बदलता है, इंसान की ज़रूरतें बदलती हैं। पहले का जमाना कुछ और था  गांवों की हवा शुद्ध थी, पानी साफ था, जीवन सरल था। लोग प्रकृति के पास रहते थे, दिन का जीवन दिन में ही पूरा हो जाता था, और शरीर भी साधारण मेहनत में ढल जाता था। पर आज शहरों में सब कुछ उल्टा हो गया है  तेज़ रफ्तार ज़िंदगी, प्रदूषण, भीड़, गर्मी, भागदौड़ और तरह-तरह की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें। ऐसे में अगर जैन समाज के लोग और बाकी दुनिया समय के साथ कुछ बातें बदल रही है, तो क्या यह सोचने का समय नहीं आ गया कि हमारे साधु-संतों के जीवन में भी कुछ बदलाव हों?
यह बात बिल्कुल साफ है  धर्म के मूल सिद्धांत जैसे अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, सत्य  ये छुए नहीं जाने चाहिए। यही जैन धर्म की आत्मा हैं और यही हमें बाकी सबसे अलग भी बनाते हैं। पर व्यवहार में जो बातें समय के अनुसार बहुत कठिन और शरीर पर बोझ बन रही हैं, उस पर क्या थोड़ा सोच-विचार नहीं होना चाहिए?
आज साधु-संत भीषण गर्मी में पदयात्रा करते हैं, बार‍िश में कीचड़ से भरे रास्तों पर चलते हैं, और कई बार स्वास्थ्य की ऐसी हालत बन जाती है कि इलाज भी कराना संभव नहीं रहता। अब तो कई साधुगण वृद्ध भी हैं, जिनके लिए हर दिन एक नई जगह ठहरना, नया भोजन और अलग-अलग स्थितियाँ निभाना आसान नहीं रहा। समाज तो सेवा को तत्पर है, पर नियमों के कारण कई बार कुछ नहीं कर पाता।
अब एक बात जो और भी ज़रूरी और नाज़ुक है  शौच की व्यवस्था। पहले खुले स्थान में जाना सामान्य बात थी। गांवों में जगह भी थी, हरियाली थी और स्वास्थ्य को भी खतरा नहीं था। पर आज शहरों में ऐसे स्थान हैं ही नहीं। जो हैं भी, वे अस्वच्छ हैं, वहां रोग फैलने का खतरा है, और कई बार यह मर्यादा के भी खिलाफ हो जाता है। ऐसे में यह सोचना ज़रूरी है कि क्या शुद्ध, स्वच्छ और अलग से बनाए गए ऐसे शौचालयों का सीमित और सोच-समझकर उपयोग जैन धर्म के विरोध में है, या वह एक ज़िम्मेदार, स्वच्छ और सुरक्षित जीवन की आवश्यकता है?
स्वास्थ्य को बचाना भी एक तरह की अहिंसा है  आत्महत्या जैसी स्थिति में भी धर्म पालन नहीं हो सकता। शरीर अगर साथ नहीं देगा, तो आत्मा की सेवा कैसे होगी? क्या धर्म यह कहता है कि जान जाती है तो जाए, पर नियम टस से मस न हो? नहीं। धर्म तो जीवन के साथ चलता है, मृत्यु को गले लगाना उसका लक्ष्य नहीं। समय के अनुसार चलना, बिना मूल सिद्धांत छोड़े, यही सच्चा संतुलन है।
जैन धर्म में हजारों सालों से हर विषय पर सोचने, चर्चा करने और आगम अनुसार निर्णय लेने की परंपरा रही है। आज भी यह बात विद्वानों, आचार्यों, और समाजजनों को मिलकर सोचनी चाहिए कि कैसे कुछ व्यवहारिक बातों में बदलाव लाकर साधु-संतों के संयम, साधना और स्वास्थ्य  तीनों की रक्षा की जा सके। ताकि वे अधिक समय तक समाज को दिशा दे सकें, धर्म का प्रचार-प्रसार कर सकें, और युवाओं से जुड़कर जैन धर्म को आने वाले युगों तक ले जा सकें।
धर्म कभी बोझ नहीं बनना चाहिए, वह जीवन को सरल और सुंदर बनाने का रास्ता है। अगर रास्ता मुश्किल हो जाए, तो उसे थोड़ा समतल करना समझदारी है, कमजोरी नहीं। अगर सोच साफ़ हो, श्रद्धा गहरी हो और उद्देश्य पवित्र हो, तो बदलाव कोई पाप नहीं, बल्कि पुण्य बन जाता है। बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना डर के, केवल धर्म और साधकों की भलाई के लिए सोचें
क्या आज के समय में कुछ छोटे बदलाव कर हम जैन धर्म को और भी मजबूत और जीवन के अनुकूल नहीं बना सकते?
शुरुआत एक सवाल से होती है… और जवाब मिलते हैं जब सोच सच्ची होती है।

जिनाज्ञा के विरुद्ध कुछ भी लिखने मे आया हो या मेरे शब्दों से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची हो तो  मिच्छामि दुक्कडम करता हू ।


*दिनेश देवड़ा धोका*✍️



टिप्पणियाँ

  1. बेहद खूबसूरत अति उपयोगी उल्लेखनीय आलेख विद्वता से भरा भरा । हमें समय अनुसार सोच में बदलाव लाना चाहिए। कभी कभी कहते हैं न कि हाथी चला जाता है पर पुंछ को पकड़ कर रखते हैं ।

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  2. अतिसुंदर आलेखन,समय के साथ चलना ही बुद्धिमानी है आखिर हम कबतक लकीर के फकीर बन कर जी सकते है
    जान है जहान है,कुछ सिद्धांतों में बदलाव लाने जरूरी है,धर्म करने के एक नहीं अनेक रास्ते है।बस, हमारी भावना में सच्चाई और शुद्धता होनी चाहिए.

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