जैन समाज की पर्यावरण के प्रति नई सोच
हर साल 5 जून आता है, सब जगह विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। कहीं भाषण होते हैं, कहीं रैली, कहीं सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट डालकर लोग सोचते हैं उन्होंने अपना कर्तव्य निभा दिया। लेकिन जैन समाज ने पर्यावरण को लेकर सोचने के साथ-साथ उसे जीना भी शुरू कर दिया है। अब सिर्फ बातों का नहीं, काम का ज़माना है – और यही करके दिखा रहा है जैन समाज।
अखिल भारतीय श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक युवक महासंघ ने एक ऐसा अनोखा अभियान चलाया है जिसने पेड़ लगाने को एक भावना बना दिया है। "एक पेड़, माँ के नाम" सिर्फ एक स्लोगन नहीं, अब यह एक संस्कार बन चुका है। कोई माँ के नाम पेड़ लगा रहा है, कोई बहन के नाम। कोई अपने विवाह की याद में तो कोई किसी की पुण्यतिथि पर। हर पौधा किसी की याद, किसी के प्यार और किसी भावना का प्रतीक बन गया है।
अहमदाबाद के शासन गौरव व कुल गौरव से सम्मानित समाजसेवी मुकेश चोपड़ा कहते हैं कि अगर पेड़ नहीं बचाए तो साँसें भी नहीं बचेंगी। धर्म का असली स्वरूप वही है जो जीवों के कल्याण में लगे, और पेड़ तो हजारों जीवों की आश्रयभूमि हैं।
मदुराई के स्वतंत्र पत्रकार दिनेश सालेचा का मानना है कि केक काटने या पटाखे जलाने से ज्यादा सुकून उस पल में मिलता है जब कोई पौधा धरती में रोपा जाता है और उसे बड़ा होते देखा जाता है। उनका मानना है कि हर अवसर को पौधारोपण से जोड़ना समय की माँग है।
अहमदाबाद के स्वतंत्र पत्रकार दिनेश देवड़ा धोका कहते हैं कि पेड़ लगाना अब औपचारिकता नहीं, जिम्मेदारी है। समाज की सोच अब बदल रही है। हर पौधा अब इंसान की भावनाओं से जुड़ रहा है, और यही बदलाव आने वाले समय को संवारने वाला है।
अखिल भारतीय युवक महासंघ का अभियान लोगों को सिर्फ पेड़ लगाने नहीं, पेड़ से जुड़ने की प्रेरणा दे रहा है। यह अभियान बता रहा है कि जैन समाज सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, धरती की रक्षा को भी अपना धर्म मानता है।
अब पेड़ लगाना पूजा है, हरियाली सेवा है और हर पौधा रिश्तों की परछाई बन रहा है। पर्यावरण दिवस पर सिर्फ भाषण नहीं, एक पौधा जरूर लगाना चाहिए – वो भी अपने किसी खास रिश्ते के नाम पर। यही सच्चा प्रेम है, यही धरती के प्रति सच्ची भक्ति है। यही आने वाले कल की सबसे हरी और सबसे प्यारी शुरुआत है।





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