मुहब्बत नहीं मुझे मंच से,:- दिनेश दोशी मंडार चेन्नई

 


मुहब्बत नहीं मुझे मंच से,

ना ही  तालियों की दरकार. 


वे तो खुद बज उठेगी  

गर बात होगी मेरी दमदार. 


चाहत बस इतनी मेरी

लोग पढ़े/समझे मेरे पैगाम.


और करते रहे कमेंट सरेआम,

वही होगा मेहनत का अंजाम.


कहीं मोहब्बतें कही नफरतें,

कहीं तालिया तो कहीं गालियां.


कहीं जिक्र तो कहीं फिक्र,

कहीं फ़िकरे तो कहीं फब्तियां.


ये तो इंसानी फितरत है,

जुदा खयाल हर हस्तियां.


जिसके पास जो है वही तो देगा,

फिर मैं क्यों खोऊ?अपनी मस्तियां.


तजुर्बा ए जिंदगी को पेश करना मेरा जुनून है

ये मेरा फ़र्ज़ ओ सुकून है.


चाहत नहीं मुझे सस्ती शोहरत की ,

कद्रदानों की छोटी कतार से खुश रहता हूं


बादशाह हूं अपनी मर्ज़ी का,

लश्कर नहीं रखता हूं.

दिल की कलम से 

लोगों के दिलों पर राज करता हूं.


हां में हां और जी हजूरी से परहेज़ है 

मुझे,पर मुहब्बत में यकीन रखता हूं.


ये दिल की आवाज है, 

इसी से कलम में जान भरता हूं.


✒️दिनेश दोशी

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