आसमाँ से गिरे कुछ ख़्वाब,कुछ अरमान, अहमदाबाद की धरती पर बिछी दर्द की दास्तान।


 

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चीख उठी हर रूह, 

हर दिल में मातम छाया,

जब एक ही पल में,

कुदरत ने सब मिटाया।

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खुली आँखों में था 

उड़ने का सपना सवाया,

बेरहम हादसे ने, 

हर ख्वाब को जलाया।

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किसी माँ का लाल,

किसी बहन का भाई,

एक ही पल में ज़िंदगी 

ने ली ऐसी अंगड़ाई।

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फलक था लंबा चौड़ा,

तकदीर ने उसे मोड़ा,

हर साँस थम गई, 

रिश्ता हर एक तोड़ा।

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धुएं और चीखों के बीच, 

दब गई बेकसूर आवाज़ें,

कैसे सहें ये ग़म हम, 

दिल की टूटी हुई साज़ें।

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कई घरों में पसरा, 

एक सन्नाटा गहरा,

आंखे नम हैं,दिल 

में दर्द का पहरा।

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यादें बहुत बाकी हैं, 

परआवाज़ें खामोश,

समा गई कई लाशें 

ज़मीं के आगोश।

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"दर्द ए दिल" की ये बेरहम इंतेहा थी, कई मासूम बेगुनाह जिंदगी की

"कहानी ए तबाह" थी

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_✍🏻दिनेश दोशी_

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