हर रात शहर की सड़कों पर निकलती हैं मीना बेन विजय भाई जसनानी — अबोल प्राणियों की सेवा में समर्पित एक नारी

 





अहमदाबाद। जब रात का सन्नाटा शहर पर छा जाता है और सड़कें सूनी हो जाती हैं, ऐसे समय में एक महिला हर दिन की तरह अपने सेवा-कार्य में निकल पड़ती है। नाम है मीना बेन जसनानी — एक साधारण सी महिला, लेकिन असाधारण जीवदया भावना से भरी हुई।



मीना बेन न तो किसी संस्था से जुड़ी हैं, न किसी प्रचार की भूखी हैं। वे अपनी मेहनत की पगार से अबोल प्राणियों के लिए भोजन की व्यवस्था करती हैं और हर रात शहर के कई इलाकों में जाकर भूखे कुत्तों को बिस्कुट, पनीर और दही जैसी चीज़ें खिलाती हैं।



स्वतंत्र पत्रकार दिनेश देवड़ा धोका से बातचीत में उन्होंने बताया,

"इन जानवरों के पास बोलने की ताक़त नहीं होती, लेकिन इनकी आंखें बहुत कुछ कहती हैं। जब ये मेरे पास आकर पूंछ हिलाते हैं और खाना खा लेते हैं, तो मेरी सारी थकान दूर हो जाती है। यही मेरी पूजा है।"

मीना बेन जैन धर्म की अनुयायी नहीं हैं, लेकिन अहिंसा और जीवदया जैसे सिद्धांतों पर उनकी गहरी आस्था है। उनका मानना है कि धर्म का असली रूप वही है, जो करुणा और सेवा से जुड़ा हो।

हाल ही में अहमदाबाद में हुए विमान हादसे की बात करते हुए वे भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि हादसे में कुछ अबोल कुत्तों की भी मौत हो गई, जिन्हें वो रोज़ खाना खिलाया करती थीं।

"जब मैं वहां पहुंची, तो उनके ना होने का खालीपन बहुत खल गया। जानवर भी इंसानों की तरह दर्द महसूस करते हैं, फर्क बस इतना है कि वो बोल नहीं पाते," उन्होंने कहा।

मीना बेन बताती हैं कि यह सेवा वे वर्षों से कर रही हैं। कुछ जागरूक लोग कभी-कभी सहयोग कर देते हैं, लेकिन अधिकांशतः यह कार्य वह अपने ही सीमित साधनों से करती हैं।

उनका कहना है —

"मैं जितना कर सकती हूं, कर रही हूं। पर अगर हर मोहल्ले में लोग अपने स्तर पर थोड़ी सी जिम्मेदारी लें, तो कोई जानवर भूखा नहीं रहेगा। जरूरत सिर्फ संवेदना की है।"

महिलाओं के लिए रात के समय अकेले घूमना आसान नहीं होता, लेकिन मीना बेन हर डर से ऊपर उठकर अबोल जानवरों की सेवा में जुटी रहती हैं।

उनकी यह जीवदया न सिर्फ एक प्रेरणादायक कार्य है, बल्कि समाज के लिए संवेदनशीलता और करुणा का सजीव उदाहरण भी है।

मीना बेन जसनानी जैसे लोग समाज की उस आत्मा को जीवित रखे हुए हैं, जो बिना किसी उम्मीद के सिर्फ सेवा करना जानती है।








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