"भगवान तीनों लोकों में मिल सकते हैं, परंतु सच्चे गुरु इसी लोक में मिलते हैं – और वह भी किसी-किसी को ही मिलते हैं।" – आचार्य श्री यशोवर्मसूरीजी म.सा.

 


भगवान तो तीनों लोकों में मिल सकते हैं, परंतु सच्चा गुरु इस लोक में ही मिलता है – और वह भी किसी-किसी सौभाग्यशाली को ही।” इस वाक्य को चरितार्थ करता हुआ एक  आयोजन, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पर्वतों और नदियों के मध्य, एन.एच. 48 पर स्थित (वापी अवध) श्री बगवाड़ा प्राचीन जैन तीर्थधाम में संपन्न हुआ। यहाँ आयोजित हुआ पाँच दिवसीय “श्री लब्धि-विक्रम कुमार संस्कार शिविर (L.V.K.S)”, जो केवल एक शिविर नहीं, अपितु जीवन की दिशा बदल देने वाला एक भावनात्मक और आध्यात्मिक शिविर सिद्ध हुआ।

इस शिविर के पाँच दिन बच्चों और युवाओं के लिए आत्ममंथन, अनुशासन और आत्मबल के दिवस बने। यहाँ सहभागी बालकों ने जीवन के श्रेष्ठतम संकल्प लिए  प्रभु पूजा को नित्य नियम बनाना, रात्रि भोजन का त्याग करना, कंदमूल और व्यसनों से दूरी बनाना, मोबाइल के अनावश्यक उपयोग से बचना और सबसे बड़ी बात  अपने जीवन को गुरु मार्गदर्शन से जोड़कर विहार में पूज्य गुरुदेव के साथ जीवन जीने की भावना रखना। यह सब कुछ मात्र प्रवचन या परामर्श नहीं था, बल्कि उनके हृदयों की पुकार थी, जो पूज्य गुरुदेव की पावन प्रेरणा से जागृत हुई।

शिविर के अंतिम दिन जब पूज्य आचार्य श्री यशोवर्म सूरीश्वरजी म.सा., आ. श्री भाग्ययश सूरीजी म.सा. और आ. ह्रींकारयशसूरीजी म.सा. जैसे महान विद्वानों ने अपने अमृतवाणी से सभी को संबोधित किया, तब उपस्थित श्रद्धालुओं की आँखें भावनाओं से छलक उठीं। शिविर का समापन कोई साधारण आयोजन नहीं था  वह एक ऐसा क्षण था जहाँ संवेदना, आभार और आत्मीयता एक साथ बह रही थी। पुरस्कार वितरण के समय बच्चों ने जिस ज्ञान, श्रद्धा और भाव को व्यक्त किया, वह देखकर उनके माता-पिता भी विस्मित रह गए। कई परिवारों ने यह अनुभव किया कि ऐसे शिविरों का आयोजन निरंतर होते रहना चाहिए  यही समाज के भविष्य की नींव है।

इस पावन आयोजन में संगीतकारों, कलाकारों और संवेदनशील सेवकों के साथ पूज्य गुरु भगवंतों की उपस्थिति ने संपूर्ण शिविर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। देश के विभिन्न कोनों से पधारे बच्चों ने यहाँ केवल पाँच दिन नहीं बिताए, बल्कि अपने जीवन को पुनः परिभाषित करने की प्रेरणा पाई। शिविर में जो संदेश मिले, वे केवल आम उपदेश नहीं थे  वे हर प्रतिभागी के व्यक्तिगत जीवन की दिशा तय करने वाले मंत्र बन गए। जैसे कि कहा गया – “पहले मनुष्य आदतों को अपनाता है, फिर आदतें मनुष्य को।” यह संदेश युवाओं के मन में गहराई से उतर गया। इसी प्रकार, यह भी समझाया गया कि “जो माता-पिता आपकी सबसे अधिक चिंता करते हैं, यदि आप उन्हें चिंता देने वाले बनते हैं, तो आप कपूत हैं।” इन शब्दों ने अनेक बालकों को माँ-बाप के प्रति भक्तिभाव से भर दिया।

शिविर की व्यवस्थाएँ अत्यंत सराहनीय थीं  भोजन, आवास, ध्यान, पूजा, ज्ञान प्रतियोगिताएँ, भव्य आंगी सज्जा, सब कुछ अनुशासन और समर्पण से युक्त था। श्री आदिनाथ दादा के प्राचीन जिनालय में भक्ति और ध्यान की धारा निरंतर प्रवाहित होती रही। पहली बार आयोजित हुए इस शिविर ने चारों ओर ऐसी भावनात्मक लहरें उत्पन्न कीं, जिसकी अनुमोदना समाज के हर वर्ग से हो रही है। यह शिविर वास्तव में एक अद्भुत संस्कार यज्ञ बना, जिसने भाग लेने वाले हर बालक को जैन शासन का भावी रक्षक और समाज का जागरूक सूत्रधार बनने की दिशा दी।

अब यह तीर्थधाम केवल तीर्थ नहीं रहा  यह एक प्रेरणा केंद्र बन गया है, जहाँ से सच्चे जीवन मूल्यों की ज्योति प्रज्वलित होती है। यही कारण है कि अब यहाँ होने वाले कार्यक्रमों की श्रृंखला भी उत्साह से भरी हुई है। 15 मई को वापी स्थित श्री लब्धिसूरी ज्ञानमंदिर में प्रातः 9:15 बजे प्रवचन, 16 मई को भव्य प्रतिष्ठा महोत्सव वापी भैरुधाम के समीप ऋषभ हाइट्स में, 17 मई को धार्मिक कार्यक्रम भीलाड में, और फिर 31 मई को मुंबई के पास एन.एच. 48 स्थित श्री गिरनारधाम विहारधाम, चिंचोटी नाका का भव्य उद्घाटन  यह सब कुछ केवल कार्यक्रम नहीं, एक अनवरत आध्यात्मिक प्रवाह का प्रतीक बन गया है।

यह पाँच दिवसीय शिविर अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना बन गया है  एक ऐसा आयोजन, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि जब गुरु कृपा, श्रद्धा, सेवा और संगठन एक साथ मिलते हैं, तो युग निर्माण की धारा प्रवाहित होती है। श्री बगवाड़ा तीर्थ अब यह केवल एक स्थल नहीं रहा, यह एक चेतना, एक संदेश, एक संकल्प और एक संस्कार का तीर्थ बन चुका है।



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