“जनसंख्या नहीं, जनाधार चाहिए!”

 

दिनेश देवड़ा धोका



देश में कानून तो बहुत बनते हैं, लेकिन उनका असर सिर्फ उन पर पड़ता है जो कानून मानने की आदत रखते हैं। सरकार कहती है, जनसंख्या नियंत्रण ज़रूरी है। संसाधन सीमित हैं, इसलिए दो बच्चों से ज़्यादा हुए तो सरकारी नौकरी नहीं, स्थानीय चुनाव नहीं। सबने सर झुका कर स्वीकार भी कर लिया। लेकिन जैसे ही कोई ये बोले कि हमें विधायक बनना है, संसद में जाना है, तो वही सरकार कान में रुई ठूंस लेती है और आंखों पर काले चश्मे चढ़ा लेती है। फिर कोई बच्चा गिनने वाला नहीं रहता। परिवार जितना बड़ा, उतनी बड़ी उम्मीदवारी।
पंचायत चुनाव के लिए दो बच्चों से ज़्यादा होना अपराध है, लेकिन लोकसभा में जाने के लिए बच्चे जितने ज्यादा हों, उतना ही नेता महान माना जाता है। सरकारी नौकरी के लिए अगर आदमी तीन बच्चों का बाप है, तो वो देश पर बोझ बन जाता है। पर वही आदमी अगर टिकट मांगता है, तो कहा जाता है कि देखो, ये तो खुद में एक चलता-फिरता वोट बैंक है। ऐसे उम्मीदवार की काबिलियत वोटों की संख्या से तय होती है, और उसका पूरा परिवार एक चुनावी अभियान की तरह व्यवस्थित हो जाता है।
नेता जी के घर को देखिए, लगता है जैसे चुनाव आयोग की शाखा वही है। बड़ा बेटा प्रिंटिंग प्रेस से पर्चे छपवाता है, दूसरा सोशल मीडिया पर ‘नेताजी जिंदाबाद’ ट्रेंड करवाता है, बहू मोहल्ले में घर-घर जाकर प्रचार करती है, दामाद युवाओं की टोली बनाकर बूथो में सक्रिय है, और पोते तो अभी मतदाता नहीं बने, मगर पहले से ही टोपी पहन कर घर के सामने नाच रहे हैं  वोट फॉर दादाजी के नारे लगाते है। पूरा घर चुनावी वार रूम बन जाता है। बच्चों को पालने का मकसद पढ़ाई-लिखाई नहीं, बल्कि प्रचार, प्रबंधन और मतदान का वातावरण तैयार करना हो गया है।
और उधर, वो आदमी जो दो बच्चों में ही देशहित समझता है, सोचता है कि मैंने तो देश का बोझ नहीं बढ़ाया, लेकिन सरकार मुझे अयोग्य घोषित कर रही है। उसे लगता है काश उसने भी तीन-चार और बच्चे पैदा कर लिए होते तो शायद कम से कम MLA का चुनाव तो लड़ पाता। वही नेता जी गर्व से कहते हैं कि बच्चों की संख्या नहीं, मेरा जनाधार है।
आजकल नेता बच्चे पैदा नहीं करते, वोट पैदा करते हैं। हर बच्चा एक पक्का वोटर है। हर बहू प्रचारक है, हर दामाद बूथ प्रभारी है, और हर पोता भावी रणनीतिकार है। पंचायत के लिए नियम और, संसद के लिए छूट। जिस पद पर ज़्यादा ज़िम्मेदारी हो, वहाँ मानो नियम ही बेकार हो जाते हैं। यह लोकतंत्र का चमत्कार है कि जहाँ गांव की नाली साफ करने की जिम्मेदारी है, वहाँ दो बच्चे बहुत हैं, लेकिन जहाँ देश की नीतियाँ बनानी हैं, वहाँ जितने चाहो उतने पैदा करो, कोई पूछने वाला नहीं।
छोटे पदों के लिए कसौटी कड़ी है, लेकिन बड़े पदों के लिए दरवाज़ा खुला है। दो बच्चों वाला जिम्मेदार नागरिक बन कर घर में बैठा है, और आठ बच्चों वाला संसद में बैठकर उसे कानून का पाठ पढ़ा रहा है। जनता सवाल करे तो नेता मुस्कराकर कहता है, मेरी ताकत मेरे बच्चे हैं। कभी लगता है अब वोटर लिस्ट नहीं, पारिवारिक चार्ट देखा जाएगा। नीति अब परिवार नियोजन पर नहीं, जनाधार उत्पादन पर आधारित है।
इस दौर में बच्चे अब परिवार का हिस्सा नहीं, चुनावी संपत्ति बन चुके हैं। जो नेता जितने बच्चे दिखा दे, उतना पक्का टिकट। जो मतदाता दो बच्चे दिखाए, उसे सरकारी दफ्तर से धक्के मिलते हैं। आखिर ये कैसा लोकतंत्र है जहां ईमानदारी से आबादी नियंत्रित करने वाला नागरिक बेकार हो जाता है, और बेधड़क जनसंख्या बढ़ाने वाला नेता बन जाता है।
अब अगर कोई आपसे कहे कि जनसंख्या नियंत्रण ज़रूरी है, तो आप भी मुस्कराकर पूछिए  आप चुनाव लड़ना चाहते हैं या नौकरी? क्योंकि जवाब में ही नियम बदल जाते हैं।

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