*दान का ढोंग*:- कवि_छगनलाल_मुथा-सान्डेराव
पत्नी बोली सुनो पतिदेव,
बैठे हो तुम अब बेकार।
थोड़ी मेरी मदद करो,
जाओ सब्जी लेने को बाजार।
गोभी आलू प्याज टमाटर केला,
अच्छा देखकर लाना।
नहीं दूर बाजार है अपना,
चलकर जाना चलकर आना।
गये पतिदेव चलकर बाजार में,
थककर वो हो गये चूर।
भाव सुनकर महंगी सब्जी का,
उतर गया चेहरे का नूर।
जैसे तैसे खरीदी सब्जी,
फिर निकल पड़े थे घर की ओर।
मन में आ रहा था गुस्सा,
पर पत्नी के आगे नहीं चलता जोर।
रास्ते में चलते देखा सामने से
आ रहा था एक गरीब परिवार।
सोचा इनके साथ लूंँ सेल्फी,
फिर छपवा दूंँगा उसे अखबार।
ऐसा सेल्फी लिया बढ़िया,
जैसे दान कर रहा हो सब्जी फल।
छोटे बच्चे ने हाथ आगे बढाया,
अनदेखा करके गया निकल।
बहुत लोगों की आदत ऐसी,
दान देने का करते हैं दिखावा।
दो केले देते हैं दान में,
आठ दस लोगों का फोटो निकाला।
दान करों, ऐसा करो,
एक हाथ दे दूसरे को नहीं पड़े खबर।
कौन सही कौन ग़लत है मुथा,
सब पर है प्रभु की नजर।
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*कवि_छगनलाल_मुथा-सान्डेराव*
*मुम्बई*


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