भारत की सैन्य शक्ति का सुपरसोनिक अभिमान




नई दिल्ली। विशेष संवाददाता
भारत की रक्षा क्षमताओं में गर्व का प्रतीक बन चुकी ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी श्रेष्ठता का लोहा मनवाया है। भारत-रूस की तकनीकी साझेदारी से विकसित यह सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल आज न केवल भारतीय सेना का आत्मविश्वास है, बल्कि भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा और सामरिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी बन गई है।

‘ब्रह्मोस’ नाम भारतीय ब्रह्मपुत्र और रूसी मॉस्कवा नदी के नामों को जोड़कर रखा गया है, जो दो राष्ट्रों की मैत्रीपूर्ण तकनीकी साझेदारी का प्रतीक है। इसकी विकास यात्रा 1998 में उस समय शुरू हुई जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की उपस्थिति में ब्रह्मोस एयरोस्पेस की स्थापना की गई।

ब्रह्मोस मिसाइल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गति और सटीकता है। यह माक 2.8 की रफ्तार से उड़ान भर सकती है, जो इसे दुनिया की सबसे तेज क्रूज़ मिसाइलों में स्थान दिलाती है। यह ज़मीन, समुद्र, पनडुब्बी और वायु से दागी जा सकती है, जिससे भारत को त्रि-आयामी प्रतिरोध की अद्वितीय क्षमता प्राप्त हुई है।

पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों पर हुए लक्षित हमलों में ब्रह्मोस का उपयोग कर भारत ने जिस तरह दुश्मन की सीमा में घुसकर सटीक और तेज़ प्रहार किए, उसने विश्व को भारत की सैन्य दृढ़ता का स्पष्ट संकेत दे दिया। इन हमलों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया करने वाला देश नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर पहले प्रहार करने की रणनीति अपनाने में भी सक्षम है। ब्रह्मोस की मारक सटीकता और क्षणों में लक्ष्य को ध्वस्त करने की क्षमता ने सैन्य विशेषज्ञों को चौंकाया और वैश्विक ताकतों को भारत की ओर नई दृष्टि से देखने पर विवश कर दिया।

हाल ही में इसकी रेंज को 290 किमी से बढ़ाकर 450 किमी से अधिक किया गया है, और अब इसे 800 किमी तक विस्तारित करने पर भी कार्य चल रहा है। इसके अलावा, हाइपरसोनिक संस्करण पर भी अनुसंधान जारी है, जो माक 7 तक की गति प्राप्त कर सकेगा।

भारत अब इस मिसाइल को मित्र राष्ट्रों को निर्यात भी कर रहा है। फिलीपींस के साथ हुई डील इसके वैश्विक सामरिक महत्व की पुष्टि है। इसके बाद वियतनाम, यूएई और इंडोनेशिया जैसे कई देशों ने ब्रह्मोस में रुचि दिखाई है। यह ‘मेक इन इंडिया’ पहल के अंतर्गत भारत को रक्षा निर्यातक देश के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

ब्रह्मोस केवल एक मिसाइल नहीं है; यह भारत की रक्षा नीति, वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का  संगम है। यह न केवल रणक्षेत्र में हमारी शक्ति है, बल्कि शांतिपूर्ण समय में हमारी कूटनीतिक मुद्रा को भी मजबूत करती है। भारत की सीमाओं की सुरक्षा अब सिर्फ सिपाहियों के हाथों में नहीं, बल्कि विज्ञान के हाथों में भी है  और ब्रह्मोस इसका जीवंत प्रमाण है।



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