सिंदूरी पराक्रम ( काल्पनिक ) प्रेरक कथानक:- अशोक दोशी

 



गांव में चुप्पी व सन्नाटा था,जन लोक समाज में परस्पर खुसर फुसर चल रही थी , कैसे कहना, कैसे उनके घर जाना, कैसे बात  करना , रेशमा व परिवार को कैसे  समझाना, क्या गुजरेगी उनपर ,बस और बस केवल वो ही बातें!!!

चुंकि  नवपरिणीत सैनिक शमशेर सिंह  दस दिन  पहले ही ड्यूटी पर गया और सीमा पर आतंकी मुठभेड़ में,लड़ते लड़ते  शहीद जो हो गया था।

शमशेर सिंह की शादी को अभी कुछ ही महीने हुए थे, उधर शमशेर सिंह की नवौढा  रेशमा  रसोई घर में खाना  बना रही थी, होगा कोई समय दस साढ़े दस का,

टीवी पर समाचार चल रहें, शमशेर सिंह व गांव का  नाम सुनते ही भौंचक्की हुई रेशमा के मन  पर एक बार के लिए गहन मायूसी छा गयी, मातम प्रसरे उससे पहले रेशमा संभल कर चौकन्नी हो गयी,  

टीवी बंद कर दिया, मन ही मन मन को मना लिया की शमशेर देश के लिए शहीद हुए हैं , मरे नहीं है ।

हिम्मत संजो  कर रेशमा सहज व अनजान बनी रही, जैसे  कुछ हुआ ही नहीं, डोर बेल भी बंद कर दी, मोबाइल  साइलैंट मोड़ पर रख लिया , पता था लोग बाग तो आएंगे,  रेशमा को सब बातों का एक पल में आभास  हो गया , सरकार से परिवार में किसी को काॅल भी आयेंगे।उ ससे पहले कि बुढ़े सास ससुर को कोई भनक न‌ लगे, हिम्मत वान रेशमा ने ऐसा माहौल  रखा, 

 रेशमा ने अस्पताल  जाने का बहाना बनाया , अपने सास ससुर को  ग्यारह बजे यानी समय से पहले खाना वाना  खिला दिया, वे मान भी गये ।

क्योंकि रेश्मा को पता था कि बुढ़े हो चूके  सास ससुर  ऐसा दिल दहलाने  वाला पैगाम सुन नहीं पाएंगे, और बाद में  उन्हें खाना आदि खिलाने में भी कष्ट होगा।

सैनिक  की पत्नी थी पढ़ी लिखी थी,उसे बाद के दृश्य की तो कल्पना थी , धैर्य से काम लेकर रेशमा ने सजगता व हिम्मत दिखाई।  उसने  मानो ठाना हुआ था सैनिक शहीद होने के लिए जन्म लेते है , और रेशमा को सैनिक की पत्नी होने पर गर्व था ।

 समाचार लेकर लोगों का आना व बाद में शव पेटी आने पर घर में जो आक्रंद हुआ था उसकी हम आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं । 

फिर तो रेशमा भी अपने को रोक नहीं पायी।सर व छाती पीट पीट कर मन को हल्का किया।  एक बार तो बेहोश भी हुई।पर बाद में खुद को संबल देकर संभल गयी।

कुछ  महीनों बाद रेशमा के पुनर्विवाह की बात चलाने वाले  बहन भाई ,,सगे स्वजनों को बड़ी विनम्रता से रेश्मा ने साफ इन्कार कर दिया, भूल से भी यह  बात कोई न  निकालें,मेरी जवाब देही है,बुढ़े सास ससुर को संभालने की।

उनके सामने या पीछे मुझे  मनाने की बात भी मत करना और देखो, मैं अब एक संतान की माॅं भी बनने वाली हूॅं,  मैं सोच भी नहीं सकती कि मैं पुनर्विवाह करुं, मैं नै शमशेर से फेरे लिए है, फेरो का महत्व मैं जानती हूॅं।

मैं राजपुतानी हूॅं और यह मेरा अटल निर्णय फेरे लेते ही हो चुका है, और यह मेरा व्यक्तिगत मसला भी  है ।और कोई अन्य ऐसा करें (फिर से शादी )उसे मैं उसे बुरा नहीं कहती , सबकी अपनी सोच रहती है । मैं तो इकलौती बहु  हूॅं, और कौन है जो सास ससुर को  संभालेगा।

शमशेर की व मेरी संतान को चाहे वो‌ लड़का हो या लड़की, उसकी,परवरिश कर उसे फिर तैयार करूंगी देश के लिए। 

वे  अपनी जिंदगी को कुर्बान कर गये हैं, मैं उनके नाम का  सिंदूर कभी  नहीं मिटाऊंगी, 

चुंकि शमशेर मरे नहीं है अमर हुए है ।  रेशमा ने अपना सिंदूरी  प्रेरक पराक्रम दिखाया, सगे स्नेही समाज  वाले सभी स्तब्ध थे, चकित थे, दंग थे।


लघुकथा:अशोक दोशी

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