खुशियों में भी इनकी मौजूदगी हो :- दिनेश देवड़ा धोका
जब भी देश पर कोई मुसीबत आती है कहीं बाढ़ आ जाए, भूकंप से ज़मीन हिलने लगे, दंगे भड़क उठें, कोई बच्चा बोरवेल में गिर जाए या फिर दुश्मन सीमा पर हमला कर दे तो सबसे पहली आवाज़ उठती है, "सेना को बुलाओ!" क्योंकि हमें पता है, जब हर रास्ता बंद हो जाता है, जब हर उम्मीद कमजोर पड़ जाती है, तब भारतीय सेना सबसे पहले खड़ी मिलती है। वो बिना कोई सवाल किए, बिना थके, बिना रुके डटी रहती है हमारे लिए, इस देश के लिए।
लेकिन जब बात आती है खुशी की, कोई उद्घाटन हो, मंच सजाया जाए, पुरस्कार बांटे जाएं या रिबन काटा जाए, तो हम किसे बुलाते हैं? फिल्मी सितारे, नेता, सेलिब्रिटीज जिनके लिए ये सब बस एक और इवेंट होता है। और उस फौजी का क्या? जिसने हमारे चैन की नींद के लिए अपनी रातें जगा दीं। जिसने त्योहारों की मिठास छोड़कर बारूद की बू में वक़्त बिताया। जो रक्षा बंधन पर बहन से मिलने नहीं आ सका क्योंकि उसे सरहद की रक्षा करनी थी। जो होली की रंगत छोड़कर बर्फ की सफेदी में तैनात रहा। और सिर्फ वही नहीं, उसका परिवार भी। वो मां, जो सालों से बेटे को गले लगाए बिना बस तस्वीर से बातें करती है। वो पत्नी, जो करवाचौथ का व्रत चांद के साथ तिरंगे को देखकर खोलती है। वो बच्चे, जिनके पापा सिर्फ स्कूल की ड्रॉइंग शीट पर होते हैं, घर में नहीं।
क्या वाकई हम इतने खुदगर्ज हो गए हैं कि हम उनकी कुर्बानी को सिर्फ आपातकाल तक सीमित कर दें? क्या उन्हें सिर्फ खतरे के वक़्त याद करना ही काफी है? नहीं, अब वक्त है सोच बदलने का। अब वक्त है उन्हें सिर्फ सरहद पर ही नहीं, अपने दिल और समाज के हर जश्न में जगह देने का। जब भी कोई कार्यक्रम हो, कोई शादी, कोई मंच, कोई सम्मान उसमें हमारे फौजी भाई और उनके परिवार भी आमंत्रित होने चाहिएं। क्योंकि उन्होंने हमारे लिए जो छोड़ा है, वो अनमोल है। और हम उन्हें बस तालियों से नहीं, अपनापन देकर, उन्हें अपनी खुशियों में शामिल करके सच्चा सम्मान दे सकते हैं।
अब वक्त आ गया है कि जब कोई कहे “सेना को बुलाओ”, तो वो सिर्फ मुसीबत में नहीं, बल्कि हमारी खुशियों में भी कहा जाए। क्योंकि असली नायक वही हैं जो अपने लिए नहीं, देश के लिए जीते हैं। वर्दी वालों को हमारा हर सलाम, और हर जश्न में उनका सम्मान।
जय हिन्द। वंदे मातरम्।
दिनेश देवड़ा धोका



बहुत खूबसूरत सटीक सच्च को बयां करता आलेख
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