मांँ की ममता का नहीं पार*:- *कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव*
मांँ की ममता का नहीं पार,उसी ने दिया जीवन संवार।
मांँ के आशीर्वाद से ही होगा,सबके जीवन का उद्धार।
मांँ ने अपना दूध पिलाया, हमें जग में जीना सिखाया।
रात रात भर जाग जागकर,लोरी गाकर हमें सुलाया।
खुद गीली चादर पर सोई, हमको सुखे में सुलाया।
खुद भुखे रहकर उसी ने हमें पेट भरकर के खिलाया।
हमारी ख़ुशी में वो खुश थी, दुःख में हमारे रोई थी वो।
नहीं उसे कभी दुःखी करना, हमारा ही हैं भरोसा जो।
नहीं चाहिए धन दौलत मांँ को, उसे आदर मान चाहिए।
आकर बैठे पास,बोले मीठे दो बोल,ऐसी संतान चाहिए।
मांँ है गंगा,मांँ जमुना है,मांँ हैं सारी नदियों की धार।
सारी पृथ्वी की सिंचाई करती, मांँ की ममता हैं अपार।
धरती मांँ भी हमे देती है,धन धान्य, पेड़ो की बहार।
पेड़ों से ही आक्सीजन बनती, जिससे जिंदा सारा संसार।
मांँ महालक्ष्मी,मांँ सरस्वती, मांँ अम्बे जग में तारणहार।
जिनकी कृपा और दया दृष्टि से हो जाता सबका उद्धार।
दूध दही और घी से होता है,शरीर में शक्ति का संचार।
गौ माता के गोबर मुत्र से, होता कई रोंगो का उपचार।
मातृभूमि हमारी भारत माता, नमन करू मैं बारम्बार।
जान से भी प्यारा वतन हमारा, वंदन करे हजारों बार।
सब माता की लेकर आशीष,अपने जन्म को लेना संवार।
मांँ के आशीर्वाद से ही होगा,मुथा अपने जीवन का उद्धार।
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*कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव*
*मुम्बई*

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