आचार्य श्री यशोवर्मसूरीश्वरजी के सान्निध्य में हुआ प्रभु शीतलनाथ का भव्य प्रतिष्ठा महोत्सव


वापी। धर्म की पवित्र भूमि पर उस समय आध्यात्मिक ऊर्जा की लहर दौड़ गई जब मुंबई हाईवे टच स्थित हृदयस्पर्शी विहारधाम – गिरनार धाम के उद्घाटन हेतु पधारे पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद विजय यशोवर्म सूरीश्वरजी महाराजा  ने वापी में प्रभु प्रतिष्ठा का पावन कार्य संपन्न कराया।


श्री अजितनाथ दादा के दर्शन के पश्चात पूज्य गुरुदेव ने श्री गुरुलब्धि चौक से प्रभु शीतलनाथ दादा की तेजस्वी स्फटिक मूर्ति को शोभायात्रा के साथ वापी के ऋषभ हाइट्स स्थित श्री हर्षाकिशोर शाह के गृह मंदिर तक  शोभायात्रा में उमड़ी श्रद्धालुओं की अपार भीड़, प्रभु भक्ति के गीतों और घोषणाओं से गूंजता वातावरण, और प्रभु के प्रति छलकता जनजन का समर्पण – यह सब दृश्य एक आध्यात्मिक पर्व बन गए। गृह मंदिर में हुई प्रतिष्ठा पूरे वैभव और धार्मिक गरिमा के साथ संपन्न हुई।

गुरुदेवश्री ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि "जब प्रभु घर में आते हैं तो वह घर मंदिर बन जाता है, और जब प्रभु मन में आते हैं तो वह मन मंदिर। जिस मन में प्रभु का वास हो, वहां विकार, अहंकार और प्रपंच नहीं टिकते। जैसे सूर्य के आने से अंधकार मिट जाता है, वैसे ही प्रभु के आने से जीवन के दुर्गुण दूर हो जाते हैं।"

गृह मंदिर के विषय में समाज में व्याप्त भ्रांतियों पर भी पूज्य गुरुदेव ने सटीक मार्गदर्शन देते हुए कहा कि "आज भी कुछ लोग यह सोचते हैं कि यदि हम गृहस्थ जीवन में प्रभु को घर में रखें तो उससे पाप बंधते हैं, अशातना होती है, इसलिए मंदिर न बनाएं। यह सोच उतनी ही गलत है जितना कि डायरिया के डर से खाना छोड़ देना।" उन्होंने स्पष्ट किया कि "ध्यान और मर्यादा के साथ यदि घर में प्रभु का वास हो, तो वही घर मंदिर बन जाता है और आत्मकल्याण का माध्यम बनता है।"

पूज्य गुरुदेव की वाणी ने न केवल जनमानस को झकझोरा बल्कि उन्हें प्रभु की ओर एक कदम और बढ़ने की प्रेरणा भी दी। वापी की यह ऐतिहासिक प्रतिष्ठा एक नई आस्था का संचार कर गई, जिससे अब संपूर्ण समाज गृह मंदिर की महिमा को नए दृष्टिकोण से देखने को प्रेरित हुआ है।

अब पूज्य आचार्य श्री का प्रवास क्रमशः भीलाड़, उमरगांव, कोसबाड़, दहानु रोड, सामटा, बोइसर और पालघर की ओर है, जहां श्रद्धालुजन उनके स्वागत के लिए आत्मीयता से तत्पर हैं। वापी की पवित्र भूमि आज भी उस दिव्यता को अनुभव कर रही है जो प्रभु शीतलनाथ और गुरुवाणी के संगम से उत्पन्न हुई थी।



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