जैन धर्म में आखा तीज की परंपरा और प्रभाव - डॉ. दिलीप धींग

 


भारतीय स्वतंत्रता संग्रामलड़ने में महात्मा गांधी ने अहिंसक प्रतिरोध के रूप में उपवास को भी हथियार बनाया था।

जैन समाज में हजारों तपस्वी वर्षीतप और अनेक अन्य तपस्याएं करते हैं। यदि सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टि से देखें तो उनकी तपस्या के फलस्वरूप देश में लाखों टन अनाज की बचत होती है। यह अनाज परोक्ष रूप से भुखमरी से लड़ने में काम आता है। गरीब की रोटी को सस्ता बनाता है। इस प्रकार तपस्या से कई प्रकार के समष्टिगत लाभ भी होते हैं। आज के उपभोक्तावादी युग में हजारों जैन तपस्वियों द्वारा साल दर साल वर्षीतप की आराधना विस्मित करती है।
आखा तीज के पारणे के लिए अनेक तपस्वी आदिनाथ परमात्मा को समर्पित प्रसिद्ध तीर्थ शत्रुंजय (पालीतणा) पहुँचते हैं। गुजरात में स्थित इस श्वेताम्बर तीर्थ पर तपस्वियों और उनके परिजनों का मेला लगता है। स्थानकवासी परंपरा में तपस्वी अपने परिजनों के साथ अपने-अपने गुरुदेव के सानिध्य में पारणा करने के लिए पहुँचते हैं। स्थानकवासी परंपरा में इस युगीन शुरुआत का श्रेय मरुधर-केसरी मुनि मिश्रीमलजी महाराज को जाता है।
कोई तपस्या कर सके या नहीं कर सके, परन्तु तपस्वी के तप में बाधक नहीं बनें। हो सके तो सहायक बने। तपस्या करने वाले और नहीं करने वाले भोजन में कभी जूटन नहीं छोड़ें। स्वाद-लोलुपता छोड़ें। मिश्रित होटल में भोजन का निषेध करें। किसी के जीमण (सामूहिक भोज) में कोई कमी नहीं निकालें। व्यसनमुक्त रहें। शाकाहार का प्रचार करें। कोई कष्ट में हो तो उसकी सहायता करें। किसी का उपहास न करें। कषाय मंद करने की साधना करें। ऐसी छोटी-छोटी बातों का विवेक रखकर, उनका यथासंभव पालन करके तपस्या, तपस्वी और तपोत्सव की सच्ची अनुमोदना की जा सकती है।
फोटो: तमिलनाडु में आचार्य कुंदकुंद की तपोभूमि पोनूरमलै पर लेखक डॉ. दिलीप धींग 

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