डॉ. दिलीप धींग के शोधग्रंथ की समीक्षा

 


आगमिक अर्थव्यवस्था व जनजीवन की झाँकी है 'मूल्यात्मक अर्थशास्त्र'
                              - • संजीव जैन,
करनाल (हरियाणा)


भगवान महावीर के 2550वें निर्वाण कल्याणक वर्ष के उपलक्ष्य में अभुषा फाउंडेशंस, चेन्नई द्वारा प्रकाशित एवं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त, जैन जगत के प्रमुख व प्रथम श्रेणी के साहित्यकारों में
शुमार डॉ. दिलीप धींग द्वारा लिखित 'मूल्यात्मक अर्थशास्त्र' नामक पुस्तक स्वयं लेखक ने गोहाना (हरियाणा) में बहुश्रुत जयमुनि की निश्रा में आयोजित प्राकृत संगोष्ठी (अक्टूबर - 2024 ) में मुलाकात के दौरान मुझे हस्ताक्षरित करके दी थी ।
जैन आगम साहित्य के आलोक में आर्थिक मीमांसा करने वाली यह पुस्तक लेखक की धर्म,समाज व देश को अनुपम भेंट है। यह पुस्तक उनके पीएच.डी. के शोधग्रंथ का संवर्धित रूप है, जो आगमिक अर्थशास्त्र को नए आलोक, नए संदर्भ, नए परिप्रेक्ष्य एवं चिंतन के नए पहलुओं में समझाने के अपने उद्देश्य व प्रयास में पूर्णतः सफल रही है।
डॉ. दिलीपजी जैसी उच्चकोटि की शख्सियत को हम जितने मर्जी सम्मानों से नवाज लें, उनकी लेखनी का चाहे जितना बहुमान कर लें, उनकी विद्वता की चाहे जितनी स्तुति कर लें,
उनके प्रयासों का चाहे जितना गुणगान कर लें और उनकी सतत लगन, उत्कंठा व परिश्रम का चाहे जितना यशोगान कर लें, वह उनके कृतित्व के समक्ष न्यूनतम ही दिखाई देता है। उनकी लिखित संपादित सत्तर से अधिक पुस्तकें आ चुकी हैं। उनकी हजारों रचनाएँ सैकड़ों
पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। यह सिलसिला सतत जारी है। एक कुशल, प्रखर व सफल वक्ता के रूप में उनकी एक अलग ही छवि देशभर के विद्वानों एवं संत-महात्माओं के मध्य प्रतिष्ठित है।
ज्ञान-ध्यान, स्वाध्याय, सृजन, लेखन के क्षेत्र में डॉ. दिलीप धींग एकल मानव सेना (वनमेन आर्मी) के रूप में प्रयासरत व कार्यरत हैं। सामाजिक माध्यमों (सोशल मीडियां) में उनकी एक विशिष्ट, गरिमामय और प्रामाणिक उपस्थिति दृष्टिगोचर होती है। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अनेक साधु-साध्वियों और शोधार्थियों को महत्वपूर्ण शोध मार्गदर्शन व सहयोग प्रदान किया है। शसुन जैन महाविद्यालय, चेन्नई में जैनविद्या विभाग के शोध प्रमुख के अलावा वे 9 वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय
प्राकृत शोध केन्द्र के निदेशक रहे हैं।
वे कई संस्थाओं से सम्बद्ध हैं और अपनी महनीय सेवाएँ दे रहे हैं। जैन धर्म की सभी आम्नायों द्वारा उन्हें सम्मानित किया जाता रहा है। आचार्य हस्ती स्मृति सम्मान (2006), आचार्य हस्ती अहिंसा अवार्ड (2015), अणुव्रत लेखक पुरस्कार (2016) सहित दर्जनों प्रतिष्ठित पुरस्कारों व सम्मानों से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। आकाशवाणी उदयपुर और चेन्नई से समय-समय पर उनकी वार्ताएँ प्रसारित होती रहती हैं। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि डॉ. धींग, जो एक व्यक्ति नहीं वरन एक संस्था के रूप में धर्म व साहित्य - साधना में निरंतर प्रगतिमान हैं । लेखक के व्यक्तित्व की ऊँचाई के संक्षिप्त परिचय के बाद हम हमारे मुख्य विषय, मूल्यात्मक अर्थशास्त्र की समीक्षा करेंगे। पुस्तक के विषय में दो पंक्तियाँ इस प्रकार मेरे मनोभावों में तैर रही हैं- 'मूल्यात्मक अर्थशास्त्र' ग्रंथ समाज को, दिलीप धींग का है उपहार।
अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह बने, आगमिक अर्थशास्त्र के आधार ।
छह अध्याय एवं प्रभावी उपसंहार से सुसज्जित यह पुस्तक एक आम पुस्तक नहीं है, अपितु एक शोधग्रंथ है। इसे जैन धर्म की हस्त पुस्तक (हैंडबुक ऑफ जैनिज्म) कह सकते हैं। आगम में
प्रयुक्त अनेक शब्दों का सुंदर तरीके से परिचय करवाती है। 'गागर में सागर भरने वाली यह पुस्तक एक अत्यन्त मूल्यवान कृति है, जो ज्ञान पिपासुओं और शोधार्थियों को जैन धर्म के एक नए
दृष्टिकोण से रूबरू करवाती है। इस पुस्तक ने मेरे ज्ञान को भी वृद्धिंगत किया है।
‘आगम साहित्य का मूल्यांकन' नामक प्रथम अध्याय में जैनागमों का परिचय प्रस्तुत किया गया है। 32 आगमों के नाम और 45 आगमों में कौन-कौन से आगम व प्रकीर्णक समाविष्ट हैं,बताया गया है। दिगंबर आम्नाय के ग्रंथों, जैसे षट्खण्डागम, कषायपाहुड, धवला, जय धवला, तथा आचार्य कुंदकुंद प्रणीत समयसार, नियमसार आदि अनेक ग्रंथों की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।
इसमें यह बताया गया है कि अंगप्रविष्ट व अंगबाह्य आगम क्या होते हैं। अंगप्रविष्ट तीर्थंकर व गणधरों द्वारा रचित और अंगबाह्य विशिष्ट ज्ञानी स्थविरों द्वारा रचित होते हैं ।
निर्युक्ति, भाष्य, चूर्णि व टीका में क्या अंतर है, इसकी जानकारी भी हमें इस अध्याय में मिलती है। नियुक्तियों में आगमिक शब्दों की व्याख्या, भाष्यों में विस्तृत विवेचन, चूर्णियों में निगूढ
भावों को लोक कथाओं के माध्यम से समझाना और टीकाओं में आगमों की दार्शनिक दृष्टि से विवेचना शामिल होती है। जैनागमों व ग्रंथों के परिचय में लेखक ने कम शब्दों में अधिक कहा है।
श्वेतांबर व दिगंबर आम्नाय के कुछ अंतर को समझाने का सफल प्रयास किया है।
द्वितीय अध्याय ‘जैन परंपरा में अर्थ विचार' में आगमों के संदर्भ देकर बताया गया है कि आगम युग में अत्थसत्थ (अर्थशास्त्र) विषयक ग्रंथों की रचना होती थी। मुनि डॉ. नगराज एवं
साध्वी डॉ. मंजूश्री ने अपने ग्रंथों में सप्रमाण कहा है कि चाणक्य जैन धर्मावलम्बी थे। चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में लिखा है- प्राचीन आचार्यों ने जिन अर्थशास्त्रीय ग्रंथों की रचना की थी, उनका सार लेकर ही मैंने अर्थशास्त्र की रचना की है।
मानव प्रकृति के चार तत्व धम्मसद्धा, अत्थलोलुए, कामकामे व संवेग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का अंतर्संबंध इस अध्याय में दर्शाया गया है। लेखक ने बताया है कि अर्थशास्त्र में श्रम का महत्व
इतना बढ़ा कि मनुष्य को संसाधन कहा जाने लगा। धनोपार्जन के साधनों में श्रम, पूँजी व प्रबंध को गिना जाता है। ये तीनों भूमि व प्रकृति में उपलब्ध चीजों को उचित प्रकार से प्राप्त करने के माध्यम हैं। लेखक ने आगमों के उदाहरण उद्धृत करके वर्तमान वाणिज्यिक प्रबंध के साथ आगम कालीन व्यापारियों की तारतम्यता समझाने की कोशिश की हैं।
आगमयुगीन प्रचलित विभिन्न मुद्राओं के नाम, जैसे- मास, अर्धमास, रुवग, हिरण्य, सुवर्ण, दीनार, कार्षापण, माष कार्षापण, खोटे कार्षार्पण आदि दिए हैं। इनसे लेखक की लगन, मेहनत,
ज्ञान व विस्तृत अध्ययन स्पष्टतया दृष्टिगोचर होते हैं। उस समय के श्रेष्ठी, सार्थवाह और वणिक बैंकिंग का काम करते थे। राज्य द्वारा कृषि उपज पर दसवें भाग से लेकर एक चौथाई भाग कर रूप में लिया जाता था । अठारह प्रकार के करों का नामोल्लेख भी किया गया है। लेखक ने ‘जैन आगमों में आर्थिक जीवन' नामक अध्याय में आगमयुगीन आर्थिक जनजीवन
का विस्तृत चित्रण किया है। प्राथमिक, द्वितीयक व वाणिज्यिक इन तीन भागों में व्यापार विभक्त होता था। इस पूरे अध्याय में गाँवों के विभिन्न प्रकार व नामकरण, फलों व सब्जियों की किस्मों व प्राकृत नामों, धान्य भंडारण के पात्रों, कृषि के विभिन्न कार्यों के नामों आदि का विवरण व परिचय अल्प-से विस्तार में जिस बेहतरीन तरीके से दिया गया है; उससे लेखक की विषय पर पकड़ का
अहसास बखूबी हो जाता है। इस अध्याय में पशुपालन बारे में भी जानकारी दी गई है। उस समय में फलों के नाम, उन्हें पकाने के विभिन्न तरीके, वनों की उपयोगिता, लकड़ी के उपयोग, पत्थरों व रत्नों के नाम आदि भी इसी अध्याय में लेखक ने उपलब्ध कराए हैं।
आगमयुग में वस्त्र उद्योग का जो खाका लेखक ने खींचा है, वह बहुत विस्तार लिए हुए हैं।
यह पूरा अध्याय ही बहुत विस्तृत है। इसमें पुरुषों की 72 तथा महिलाओं की 64 कलाओं के नाम, व्यापारिक केन्द्रों के नाम और विभिन्न कार्यों व शिल्पों के नामों का उल्लेख है। लेखक ने विस्तृत
अध्ययन के साथ-साथ कितनी लगन व परिश्रम से कार्य किया होगा, इसका अनुमान इस अध्याय के अध्ययन से लग रह जाता है। संक्षिप्त में इस अध्याय की चर्चा कर पाना अशक्य व दुष्कर है।
लेखक ने रोहिणी, माकन्दी, धन्ना, समुद्रपाल आदि सार्थवाहों की संक्षिप्त कथाएँ भी इस अध्याय में दी हैं।
'गृहस्थाचार और अर्थव्यवस्था नामक चतुर्थ अध्याय में गृहस्थ के आर्थिक जीवन की विवेचना दी गई है। गृहस्थ के 5 अणुव्रतों, 3 गुणव्रतों व 4 शिक्षाव्रतों की उनके आतिचार सहित और 15 कर्मादानों का संक्षेप में बहुत उत्तम प्रस्तुतिकरण किया गया है।
इसके साथ 12 अणुव्रतों की प्रेरणाओं का सार भी दिया गया है। दान की महिमा, दान के 10 प्रकार बताने के साथ-साथ अधिक योग्य व विशेषज्ञ व्यक्तियों को अपनी योग्यता से औरों को
लाभान्वित करने का लिए मार्गदर्शन भी किया गया है। जगडूशाह, भामाशाह और अमरचन्द बाँठिया जैसे दानवीरों का जिक्र भी इस अध्याय में किया गया है। इन दानवीरों का वृत्तांत पढ़कर तो
सीना गर्व से फूल जाता है कि जैन समाज ने ऐसे 'शासन हीरक' व्यक्तित्व देश को दिए हैं। राजा बीसलदेव ने जगडूशाह की प्रशंसा करते हुए कहा था, "आप भारत माँ के सच्चे सपूत, मानवता का शृंगार और सबके वंदनीय हो । अतः भविष्य में प्रजाजनों के समान मुझे नमन नहीं करोगे।”
स्थानांग सूत्र में वर्णित ग्राम नगर व राष्ट्र आदि दस धर्मों के बारे में आधुनिक शासन प्रणाली से जोड़कर बताया गया है। सप्त कुव्यसन त्याग तथा गृहस्थों की मार्गानुसारी के 35 गुणों की आर्थिक दृष्टि से विवेचना भी इस अध्याय में भली-भाँति व्याख्यायित की गई है। ऐसा लगता है कि लेखक ने अर्थशास्त्रीय ही नहीं, वरन आगम युग के लोगों की जीवनचर्या को ही हमारे समक्ष प्रस्तुत करके रखा दिया है। 'अहिंसा और संयम का अर्थशास्त्र अध्याय में जैन धर्म के सिद्धान्त व दर्शन का अर्थशास्त्र के साथ सहसंबंध प्रदर्शित किया गया है। इस अध्याय में लेखक ने 9 पुण्य, 18 पाप, 12 प्रकार के तप, अनेकांतवाद, कर्मवाद, पुनर्जन्म के सिद्धान्त, आठ कर्म, चार कषाय और उनके प्रकार,
लेश्याओं, स्थावर व त्रसजीव शाकाहार, संयम और उसके प्रकार और अजीव के प्रति भी संयम की बहुत गहराई के साथ सरल शब्दों में प्रस्तुति दी है। विषय पर पूरी पकड़ के साथ विवेचन व वर्णन किया है। जैन दर्शन और सिद्धान्तों को एक ही अध्याय में पाठक के समक्ष प्रस्तुत करके अनेक विषयों को सहजतया ही हस्तगत कर अपनी विद्वता व सक्षमता को प्रमाणित कर दिया है।
लेखक ने जिस प्रकार कषाय, कर्म, तप, सप्त कुव्यसन आदि के बारे बहुत ही कम व सधे हुए शब्दों में विस्तृत विषय को अवगत करवाया है; वह अद्भुत है।
'आगमिक व आधुनिक अर्थशास्त्र अध्याय में आगमयुगीन अर्थशास्त्र की आधुनिक अर्थशास्त्र के साथ तुलना करके बताया गया है कि आज के अर्थशास्त्र के मूल्यों की अपेक्षा आगम काल के आर्थिक मूल्य सामाजिक समरसता, उत्थान व समता के पक्षधर हैं। अध्याय के प्रारंभ में भगवान
महावीर के जीवन की घटनाओं को आगामिक अर्थशास्त्र के संदर्भ में जानने का सफल प्रयास किया गया है। अपरिग्रह आगमिक अर्थशास्त्र का केन्द्रीय सिद्धान्त है । अस्तेय के साथ संबंध, परिग्रह के भेद-प्रभेद, परिग्रह के 30 नाम तथा अपरिग्रह की विस्तृत व्याख्या भी इस अध्याय में हमें भली प्रकार से पढ़ने, जानने व समझने को मिलती है ।
चन्द्रगुप्त मौर्य पर भी जैन धर्म का प्रभाव दर्शाया गया है। वसुदेवहिण्डी, कुवलयमालाकहा
व नीतिवाक्यामृत आदि ग्रंथों से भी अर्थव्यवस्था के कुछ पहलुओं के संदर्भ से सामग्री दी गई है।
दक्षिण भारत के गंग साम्राज्य पर जैनत्व के प्रभाव व उपकार की जानकारी उपलब्ध होती है।
हेमचन्द्राचार्य द्वारा राजा कुमारपाल को जैन गृहस्थाचार की प्रतिज्ञाएँ दिलवाने के बारे में वर्णन हमें इस अध्याय से प्राप्त होता है। अकबर भी हीराविजय सूरिजी को गुरुतुल्य मानता था । उसने
शत्रुंजय तीर्थ से राज्य कर भी हटा लिया था । अहिंसामय व समृद्ध अर्थव्यवस्था की प्रतिष्ठा में जैनों का ऐतिहासिक योगदान रहा है।
आधुनिक पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, समाजवाद व साम्यवाद के विषय में बतलाकर उनका जैन धर्म व दर्शन के साथ तुलनात्मक अध्ययन इस अध्ययन से हमें प्राप्त होता है। साम्यवाद व
समाजवाद के दोषों का अहिंसा का अर्थशास्त्र किस प्रकार निराकरण कर सकता है, वर्णित किया गया है। महात्मा गाँधी का न्यासिता का सिद्धान्त अपरिग्रह से ही अनुप्राणित था । भूमण्डलीकरण के दौर में मनुष्य, मनुष्य न रहकर, उपभोक्ता बन गया है । परमाणु हथियारों के जखीरे पर बैठी
दुनिया को कैसे अहिंसा का सिद्धान्त शांति दे सकता है, यह भी समझाया व बताया गया है।
भगवान महावीर का अथवा आहिंसा का अर्थशास्त्र अपरिग्रह, अचौर्य, आत्म संयम, परस्पर सहयोग की भावना, प्रकृति के संरक्षण के प्रति जागरुकता आदि कल्याणकारी मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में
यह पुस्तक आगमयुग के आर्थिक मूल्यों का दिग्दर्शन प्रस्तुत करती है। आखिरी उपसंहार में पूरी पुस्तक का सार तो दिया ही गया है। साथ ही पाठक कुछ ही पृष्ठों में पूरी पुस्तक की दोबारा यात्रा कर सकता है।
'मूल्यात्मक अर्थशास्त्र' नामक इस पुस्तक में अनेक बिंदु, संदर्भ, कथन, विषय, व्याख्याएँ और नामोल्लेख आदि ऐसे प्रभावी हैं, जो एकदम पाठक का ध्यान अपनी और आकर्षित कर लेते
हैं। ऐसे ही चार-पाँच बिन्दु मैं आप सबके समझ प्रस्तुत कर रहा हूं-
1. असि, मसि, कृषि को अर्थशास्त्र की त्रिपदी की संज्ञा दी गई है।
2. जो शुभ श्रेष्ठ, पुनीत और प्रशस्त है, वह पुण्य है।
3. 'परस्परोपग्रहो जीवानाम् सूत्र पारस्परिक निर्भरता को प्रतिपादित करता है, जो विकास व
समृद्धि का मूलमंत्र है और आगमिक अर्थशास्त्र का आधार है।
4. आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धान्त अनेकांत का वैज्ञानिक संस्करण है।
5. माँसाहार निषेध के बारे में आचार्य महाप्रज्ञ का कथन - "माँसाहार निषेध के सबसे प्राचीन
प्रमाण जैन साहित्य के अतिरिक्त किसी अन्य साहित्य में हैं, ऐसा मुझे ज्ञात नहीं है।"
6. मद्यपान निषेध पर इतिहासकार अर्नाल्ड टॉयन्बी ने लिखा- "अति प्राचीन काल से अस्तित्व में
आई कुल 21 संस्कृतियों में से पतन का कारण शराब है।"
आगमों के अतिरिक्त जिन ग्रंथों की चर्चा इस पुस्तक में की गई है, संदर्भ व टिप्पणियाँ उद्धृत की गई हैं; वे मूल विषय की पूरक है। इससे मुख्य विषय अधिक स्पष्ट हुआ है। इस शोधग्रंथ की जितनी प्रशंसा जाए, उतनी ही कम है। यह पुस्तक ज्ञानपिपासु, स्वाध्याय रसिक, प्रज्ञावान व शोधार्थियों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है। उनके ज्ञानार्जन की राह में इसका अध्ययन करना एक भील का पत्थर साबित होता प्रतीत हो रहा है।
इस ग्रंथ का अत्यंत गहराई व अतीव तन्मयता के से अध्ययन करने के साथ-साथ मैंने इसमें से नोट्स तैयार किए हैं, जो दसवीं या बारहवीं पढ़ाई के पश्चात् 30-32 सालों में अब तक मेरे द्वारा किसी भी पुस्तक के नहीं किए गए थे। हम इसे जैन धर्म विश्वकोश (इनसाक्लोपीडिया
ऑफ जैनिज्म) भी कह दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
इस ग्रंथ में हमें अर्थशास्त्र, जो केवल उपभोक्ता, बाजार, उत्पाद और मूल्य आदि की बात करता है, के अतिरिक्त जैनागमों में वर्णित जनजीवन के आर्थिक जीवन मूल्यों की झाँकी देखने को
मिलती है। जैन धर्म का 'परस्परोपग्रहो जीवानाम् सूत्र जिस प्रकार प्राणियों को एक दूसरे का आलंबन या सहारा होता है, उसी प्रकार आगमिक जीवन के आर्थिक पक्षों को समझने में भी
मूलाधार रहा है। आगमिक अर्थशास्त्र प्रकृति, पशु-पक्षियों, जलीय जीवन व मानवीय जीवन के संबंधों की अंतर्गाथा और अंतर्संबंधों का विवरण हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है
‘मूल्यात्मक अर्थशास्त्र' जैसा उत्तम ग्रंथ सबको उपलब्ध करवाने के लिए अभुषा फांउडेशंस,चेन्नई को कोटि कोटि धन्यवाद है । पुस्तक का स्वाध्याय व गहन अध्ययन करने के पश्चात् पाठकों
का मन लेखक डॉ. दिलीप जी धींग के प्रति सम्मान व श्रद्धा के भावों से अनुप्राणित हो जाता है।
अत्यन्त गहराई से अध्ययन, चिंतन, मनन व गुणन करने के पश्चात इस पुस्तक ने मेरे जैनत्व के ज्ञान को एक नई रोशनी दी है।
लेखक के अथक परिश्रम, लगन, शोध, विद्वत्ता, कार्यकुशलता व जैन धर्म की इतनी गहरी समझ व ज्ञान रखने के लिए उनकी बारंबार अनुमोदना है। यह पुस्तक गागर में सागर सदृश अपने अंदर विस्तृत व विपुल ज्ञान को समेटे व समाहित किए हुए हैं। हर सुधी, प्रबुद्ध व ज्ञानाराधक पाठक के लिए यह पुस्तक एक बारंबार पठनीय मननीय, गुणनीय, अनुकरणीय और संग्रहणीय होने के साथ-साथ एक अनमोल गुणरत्नों की मंजूषा है।



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