क्या 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' अपनी चमक खो रहा है? पात्र बदलते गए, दर्शक उलझते गए!
पिछले डेढ़ दशक से भारतीय टेलीविजन के घर-घर में अपनी जगह बनाने वाला शो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ आज एक अजीब मोड़ पर खड़ा है। जहां एक ओर यह कॉमेडी और सामाजिक संदेशों का संगम बना रहा, वहीं दूसरी ओर इसके कई प्रिय पात्रों के बदलने से दर्शकों के दिलों में खालीपन पैदा हो गया है।
दया बेन यानी दिशा वकानी का जाना एक ऐसा मोड़ था जिसे दर्शक आज तक स्वीकार नहीं कर पाए। साल 2017 से शो में उनकी वापसी की चर्चाएं लगातार होती रहीं, लेकिन हर बार आशाएं अधूरी रह गईं। निर्माता असित मोदी ने अब साफ कर दिया है कि दिशा अब लौटेंगी नहीं और एक नई अभिनेत्री को लाने की तैयारी है—हालांकि डेढ़ साल में 15 से 25 ऑडिशन के बावजूद उपयुक्त चेहरा नहीं मिल पाया।
पर दया बेन की गैरमौजूदगी ही शो के चेहरे को नहीं बदल रही, कई अन्य मूल किरदार भी बदले जा चुके हैं। तारक मेहता का किरदार अब शैलेश लोढ़ा की जगह सचिन श्रॉफ निभा रहे हैं। टप्पू के रूप में पहले भव्या गांधी थे, फिर राज अनादकट आए, और अब नितीश भालुनी ने यह भूमिका संभाली है। अंजलि भाभी पहले नेहा मेहता थीं, अब उनकी जगह सुनयना फौजदार आ चुकी हैं। डॉ. हाथी का किरदार कवि कुमार आज़ाद के निधन के बाद निर्मल सोनी निभा रहे हैं। सोढ़ी के रूप में गुरचरण सिंह की जगह अब बलविंदर सिंह सूरी हैं। सोनू के किरदार में झील मेहता से लेकर निधि भानुशाली, पलक सिंधवानी और अब खुशी माली तक, चार चेहरे बदल चुके हैं।
हर पात्र के बदलते चेहरे के साथ दर्शकों का भावनात्मक जुड़ाव कमजोर होता गया। अब अगर भविष्य में जेठालाल, पोपटलाल, चम्पकलाल, भिड़े, बबीता और अय्यर जैसे मुख्य चेहरे भी बदल जाएं, तो यह शो केवल नाम का 'तारक मेहता' रह जाएगा—उस आत्मा और पहचान के बिना जिसने इसे देश का सबसे लोकप्रिय फैमिली शो बनाया था।
शो को जीवंत बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि उसका मूल भाव बना रहे, क्योंकि ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ केवल पात्रों का संग्रह नहीं, बल्कि एक भावना है जो हंसी, संस्कार और समाज की झलक साथ लेकर आती है। सवाल यही है—क्या चेहरे बदलकर भी यह भावना बरकरार रह पाएगी?


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