तमिल साहित्य के संदर्भ में नवकार महामंत्र
संदर्भ : 9 अप्रेल को नवकार दिवस और 10 अप्रेल को महावीर जयंती
- डॉ. दिलीप धींग -
(पूर्व निदेशक : अंतरराष्ट्रीय प्राकृत केन्द्र)
लिखी हैं। फिर भी अलिखित अधिक है। क्योंकि महान कवि तिरुवल्लुवर ने विराट दृष्टि के साथ न्यूनतम शब्दों में अधिकतम अर्थ तथा गहन भाव गुंफित किए हैं। जब नवकार मंत्र के संदर्भ में तिरुकुरल को देखते हैं तो पाते हैं कि इसमें अरिहंत और सिद्ध परमात्मा का वही स्वरूप बताया है, जो जैन आगम ग्रंथों में मिलता है ।
जैन ग्रंथों के अनुसार अरिहंत भगवान विशुद्ध ज्ञान (केवल ज्ञान ) के धारक,
अतिशय के रूप में देवताओं द्वारा बिछाए दिव्य पुष्पों पर गमन करने वाले, पंचेन्द्रिय विजेता और राग-द्वेष से मुक्त होते हैं। सिद्ध भगवान अष्ट गुणों से युक्त होते हैं। तिरुकुल के प्रथम अध्याय 'कडवुळ वाळतु' (प्रभु स्तुति) में इन्हीं गुणों से युक्त परमात्मा की स्तुति की गई है। तिरुवल्लुवर कहते हैं कि ऐसी विशिष्ट अर्हताओं के स्वामी ईश्वर को वंदन करने से, उनके गुणों की आराधना करने से महान फल की प्राप्ति होती है। साधक भवसागर पार कर सकता है। प्रथम कुरल में ऐसे ही भगवान आदिनाथ का स्मरण किया गया जो सदेह अवस्था में अरिहंत थे और देह - मुक्त होने पर सिद्ध बन गए । जैन दर्शन में पाँच इन्द्रियाँ उनके विषयों (स्पर्श, रस, गंध, रूप और शब्द ) की बहुत चर्चा होती है। जहां अरिहंत पंचेन्द्रियों के पूर्ण विजेता है, वहीं आचार्य, उपाध्याय और साधु-साध्वी पंचेंद्रियों और उनके विषयों पर विजय प्राप्त करने की साधना करते हैं। यही
बात तिरुकुरल के तीसरे अध्याय 'साधु की महिमा' में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में बताई गई है। इस प्रकार प्रथम और तृतीय अध्याय में नवकार मंत्र के पांचों ही पदों के गुणों की स्तुति की गई है। तिरुकुरल के अन्य अध्यायों में भी पाँच इन्द्रियों पर नियंत्रण के अनेक संदर्भ उपलब्ध हैं। अहिंसा, संयम, तप, क्षमा, करुणा जैसे पवित्र मूल्यों पर तो स्वतंत्र
अध्याय ही हैं। तिरुकुरल का दूसरा अध्याय वर्षा और कृषि पर है, जिसमें लोकमंगल की कामना की गई है। लोकोत्तर साधना और लोकमंगल का समन्वय तिरुकुरल की एक विरल
विशेषता है। यही विशेषता नवकार मंत्र के साथ जुड़ी है। नवकार मंत्र के पांच पदों के बाद चूलिका में उसी समग्र मंगल भाव को पिरोते हुए कहा गया है- एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं । पंच परमेष्ठी को किया गया नमस्कार सभी पापों को समाप्त करता है, तथा यह समस्त मंगलों में प्रथम मंगल है।
तमिल महाकाव्य ‘जीवक चिंतामणि' (नौवीं सदी) के नायक जीवक जब एक
मरणासन्न श्वान को देखते हैं तो करुणा व श्रद्धाभाव से उसे नवकार मंत्र सुनाते हैं ।
नवकार के प्रभाव से श्वान मरकर देवगति पाता है। नवकार के इस प्रसंग में लोकपक्ष के साथ ही प्राणी मात्र के कल्याण की कामना की गई है। तमिल के प्रथम महाकाव्य 'शिलप्पधिकारम' (दूसरी सदी) की अमर नायिका कण्णगी और नायक कोवलन अपने हर
सुख-दुख में पंच परमेष्ठी (नवकार) की आराधना करते हैं। तिरुकुरल के पहले अध्याय में जिस प्रकार पुष्पों पर गमन करने वाले भगवान की स्तुति की गई, उसी प्रकार सातवीं सदी के विद्वान पदुमनार द्वारा संकलित ‘नालडियार’
नीतिकाव्य के मंगलाचरण में भी जिनेन्द्र प्रभु को देवकृत फूलों पर विहार करने वाले बताते हुए उन्हें वंदन किया गया है। संस्कृत भाषा के भक्तामर स्तोत्र के 36वें श्लोक में भी तीर्थंकर भगवान के इस देवकृत अतिशय का वर्णन किया गया है।
प्राचीन तमिल ग्रंथ 'अरुंगलचेप्पु '
नवकार की बहुत महिमा बताई गई है। तमिल साहित्य में पाँच महाकाव्य की तरह पाँच लघु महाकाव्य भी प्रसिद्ध हैं। ये पाँचों ही लघु महाकाव्य (चूलामणि, नीलकेशी, उदयणकुमार, नागकुमार और यशोधरा) जैनों द्वारा रचित हैं।
इनमें तथा परवर्ती तमिल साहित्य में नवकार महामंत्र और पंच परमेष्ठी के संदर्भ मंगलाचरण या अन्य रूपों में मिलते हैं ।
तमिल साहित्य में प्राकृत भाषा के नवकार मंत्र का उल्लेख व उच्चारण, इन दोनों भाषाओं के चिरसंबंध व सौहार्द का गौरवशाली ऐतिहासिक तथ्य है। कन्नड़ साहित्य में प्राकृत भाषा के नवकार मंत्र का वैसा ही श्रद्धास्पद प्रवाह विद्यमान है। हिंदी राजस्थानी, गुजराती, मराठी, बांग्ला आदि अन्य प्राचीन, अर्वाचीन और शास्त्रीय भारतीय भाषाओं में भी
पंच परमेष्ठी नमस्कार मंत्र के ऐसे ही सुमधुर स्वर गूंजते हैं। भाषाई सौहार्द का यह झरना आज भी बह रहा है। तमिल जैन बंधु प्रतिदिन प्राकृत भाषा के नवकार मंत्र का श्रद्धा से सुमिरन करते हैं। देश-दुनिया के अन्य भाषा भाषी जैन
भी प्राकृत के नवकार का नित्य सुमिरन करते हैं। अनगिनत जैनेतर बंधुओं ने भी नवकार को अपने कंठ का हार बनाया और जीवन सजाया है। वस्तुतः लोकभाषा में रचा नवकार
समस्त लोक का अलौकिक मंत्र है।
संलग्न फोटो :- तमिलनाडु में आठवीं सदी के पुरास्थल ओणमबाक्कम पर्वत पर तीर्थंकर शिल्पांकन के समक्ष स्तुति करते लेखक डॉ. दिलीप धींग
7. अय्या मुदली स्ट्रीट,
साहुकारपेट, चेन्नई-600001


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