शांति का अपमान, सेवा का अनादर – कब तक सहेंगा जैन समाज?

दिनेश देवड़ा धोका

विले पार्ले में स्थित जैन मंदिर को दो दिन पहले कोर्ट के आदेश के तहत बिना किसी पूर्व सूचना के ढहा दिया गया। यह सिर्फ एक संरचना का नष्ट होना नहीं, बल्कि उस धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का अपमान है, जो इस समाज की पहचान और आस्था का प्रतीक है। जैन समाज हमेशा से शांति, अहिंसा और संयम के मार्ग पर चला है, परंतु इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि एक अहिंसक और शांतिप्रिय समाज को दबाया जाता है, जबकि हिंसा या उग्रता के मार्ग पर चलने वाले समाजों को प्रशासन अधिक गंभीरता से सुनता है। अगर यही घटना किसी अन्य समुदाय का धार्मिक स्थल होता, तो क्या प्रशासन इतनी जल्दी यह निर्णय लेता? क्या कोर्ट रात के समय भी उनकी आस्था और अधिकारों की रक्षा के लिए नही खुलता?

यह वह समाज है जिसने सदियों से अहिंसा के सिद्धांत को न केवल जीवन में अपनाया है, बल्कि देश की प्रगति में अपने योगदान से समाज को प्रेरित किया है। व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, और दान के क्षेत्र में जैन समाज ने कभी भी कोई शोर-शराबा नहीं किया, लेकिन इस देश की प्रगति में उसका योगदान अत्यधिक है। लेकिन जब बात अपनी आस्था और धार्मिक स्वतंत्रता की आती है, तो जैन समाज की आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है। इस समाज ने न कभी किसी से मांग की, न किसी से अधिकार छीनने की कोशिश की, फिर भी अब अपनी आस्था की रक्षा के लिए यह समाज मजबूर हो रहा है अपनी बात को और जोर से उठाने के लिए।

क्या यही वह देश है जहां भगवान महावीर ने अहिंसा का मार्ग दिखाया और गांधीजी ने उसी अहिंसा से दुनिया को प्रभावित किया? क्या वही देश आज अहिंसा के पक्षधर समाज की आवाज़ सुनने के लिए तैयार नहीं है? हमें उम्मीद है कि सरकार और प्रशासन इस घटना को गंभीरता से लेंगे और जैन समाज की आस्था, परंपरा और धार्मिक स्वतंत्रता को पूरी तरह से सम्मानित करेंगे। यही समय है जब जैन समाज को उसकी धार्मिक स्वतंत्रता का पूरा हक मिलना चाहिए और उसे उसकी आस्था के खिलाफ किसी भी तरह की उपेक्षा से बचाया जाए।

अहिंसा और शांति को कमजोरी मत समझिए। जब एक शांत समाज अपनी चुप्पी से पीड़ा व्यक्त करता है, तो उसकी चुप्पी भी बेहद प्रभावशाली और मजबूत होती है। अब वक्त है कि इस शांतिप्रिय समाज की आवाज़ को सुना जाए और उसे न्याय मिले।





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