*नीम्बू राजा*

 


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सुन रे मानव,सुन अज्ञान,

अब तो ले ले तूँ संज्ञान।

समय किसी का नहीं एक सा,

इस बात को ले तूँ जान।


मैं हूंँ नीम्बू छोटा अदना,

गोल मटोल हरा या पीला।

तूने मेरी कदर नहीं जानी,

मुझे नहीं तुझसे कोई गिला।


कमजोरी मे काम मैं आया,

जादू टोना मुझसे कराया।

नजर लगे नहीं किसी को,

मिर्ची के साथ मुझे लटकाया।


कई तरह के इलाज में तूने,

मेरा ही उपयोग कराया।

अपनो की नजर उतरवाने,

चार रास्ते मुझे फिकवाया।


मैं हूंँ रसोईघर का राजा,

मेरे बिना नहीं स्वाद दाल का।

मेहंदी में भी मिलाकर देखो,

आ जाता है रंग लाल सा।


आज गर्व है मुझे अपने पर,

मेरा भी अब बढ़ गया है मान।

जिसके घर में दो चार नीम्बू ,

उस घर की बढ गई है शान।


पहले रूपए के दस मिलते थे,

आज दस रुपए का एक।

बडी इज्जत है आज तो मेरी,

नहीं कोई देता रास्ते में फेक।


नहीं किसी को कमजोर समझना,

इसी बात से ले तूँ ज्ञान।

समय एक सा नहीं कभी मुथा,

छोटे बड़े सबको देना मान।

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*कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव*  

*मुम्बई*

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