जैनविद्या और प्राच्यविद्या के उपासक डॉ. धर्मचंद जैन -
संदर्भ : श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन सभा, कोलकाता द्वारा पांच लाख का 'आचार्य जवाहर जैन ज्योति पुरस्कार'
जैनविद्या और प्राच्यविद्या के उपासक डॉ. धर्मचंद जैन
- डॉ. दिलीप धींग
(पूर्व निदेशक : अंतरराष्ट्रीय प्राकृत केन्द्र)
पुरस्कार प्राप्ति के बाद
विचार व्यक्त करते हुए
पांच लाख का आचार्य जवाहर पुरस्कार ग्रहण करते हुए डॉ. धर्मचंद जैन
सदी में जिन संतों ने विद्वानों की आवश्यकता और उनके निर्माण पर काफी ध्यान दिया, उनमें युगमनीषी आचार्य श्री हस्तीमलजी महाराज एक प्रमुख नाम है। हिंदी, राजस्थानी और जैन दर्शन के विद्वान डॉ. नरेन्द्र भानावत और जोधपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति साहित्यकार प्रो. कल्याणमल लोढ़ा का मानना था कि उनके शैक्षणिक और अकादमिक जीवन की प्रगति में आचार्य हस्तीमलजी महाराज की प्रेरणा और आशीर्वाद का बहुत बड़ा संबल रहा था। ऐसे ही एक मनीषी हमारे बीच है डॉ. धर्मचन्द जैन, जिनके जीवन निर्माण में आचार्य हस्तीमलजी महाराज का मंगल आशीर्वाद जुड़ा है। साधक, मनीषी और चिंतक पंडित कन्हैयालालजी लोढ़ा डॉ. धर्मचंदजी के गुरु रहे । आचार्य हस्ती आध्यात्मिक शिक्षण संस्थान, जयपुर में पं. लोढ़ाजी का सान्निध्य पाने वाले डॉ. धर्मचंदजी ने अपनी अकादमिक यात्रा को निरंतर नित नए आयामों के साथ आगे बढ़ाया और आज भी वे यात्रायित हैं। उनके मार्गदर्शन में अनेक विद्यार्थियों ने अध्ययन व शोधकार्य किया और आज भी कर रहे हैं। उन्हें 37 वर्ष का अध्यापन अनुभव और 30 वर्ष का अनुसंधान अनुभव है । जीवन और अकादमिक जीवन में प्रामाणिकता उनकी खास विशेषता है। यह एक दुखद तथ्य है कि जैनविद्या जैसे पवित्र क्षेत्र में मोटा वेतन पाने वाले कुछ प्रोफेसर भी गोष्ठियों, पीएचडियों आदि में ऊपर की कमाई में लगे रहते हैं। इसीलिए डॉ. धर्मचंदजी की प्रामाणिकता का विशेष उल्लेख किया है। और यह उल्लेख उनकी अकादमिक उपलब्धियों से पहले किया है। क्योंकि प्रामाणिकता एक ऐसा गुण है, जिसका दर्जा विद्वत्ता से भी ऊपर है।
प्राकृत भारती अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. धर्मचंदजी ( डॉक्टर साब ) जैनविद्या और प्राच्यविद्या के एक निष्ठावान उपासक हैं। उनकी ज्ञानोपासना अनेक आयामों में अभिव्यक्त हुई है। वे मन और विचारों से उदार हैं। मैत्री से परिपूर्ण । जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर में 1992 में संस्कृत विभाग के अंतर्गत प्राकृत और जैन दर्शन के सहायक आचार्य के रूप में उनकी सेवाओं का
शुभारंभ हुआ था। फिर वे संस्कृत के सहआचार्य और आचार्य (प्रोफेसर) बने। सितंबर - 2018 तक विश्वविद्यालय में उनकी सारस्वत सेवाएँ जुड़ी रहीं। इस दौरान वे विवि में उन्होंने संस्कृत विभाग के अध्यक्ष, बौद्ध अध्ययन केन्द्र के निदेशक एवं कला, शिक्षा और सामाजिक विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता के रूप में अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन किया। 2024 2022 से दिसम्बर 2024
तक तीर्थंकर महावीर विवि, मुरादाबाद (उप्र) में जैन अध्ययन केन्द्र में प्रोफेसर के रूप में सेवाएँ दीं। जैन विश्व भारती संस्थान (मानित विवि), अन्य शैक्षणिक संस्थानों एवं उनमें प्राकृत पाठ्यक्रमों की अकादमिक परिषदों में उनकी सेवाएँ जुड़ी हुई हैं। संस्कृत बीए (ऑनर्स) और एमए, दोनों ही परीक्षाओं में राजस्थान विवि, जयपुर से स्वर्णपदक प्राप्त डॉक्टर साब ने 'जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में बौद्ध ज्ञान मीमांसा का अनुशीलन' विषय पर पीएचडी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अब तक लगभग डेढ़ सौ राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय अकदमिक संगोष्ठियों, सम्मेलनों और कार्यशालाओं में भाग लेकर शोधपत्र प्रस्तुत किए और व्याख्यान दिए हैं। उनके संयोजन में भी लगभग बीस संगोष्ठियाँ आयोजित हुई हैं। दर्जनभर विद्यार्थियों को शोध मार्गदर्शन दिया है। उनके मार्गदर्शन में तीन छात्रों ने शोधोपरांत व्याकरण, दर्शन और साहित्य में अपनी परियोजनाएँ पूरी की है।
जैन और बौद्ध दर्शन में प्रमाण मीमांसा सहित डॉक्टर साब की अब तक दस पुस्तकें
प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनके परिचय और समीक्षा पर स्वतंत्र लेख लिखे जा सकते हैं। इसी प्रकार उनके संपादन में 42 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। आचार्य हस्तीमलजी महाराज का जीवन चरित 'नमो पुरिसवरगंधहत्थीणं उनके श्रेष्ठ संपादन का लोकप्रिय प्रमाण है। 2003 में प्रकाशित नौ
सौ पृष्ठों के बड़े आकार के इस ग्रंथ पर राष्ट्रीय स्तर पर स्वाध्याय परीक्षाएँ भी हो चुकी हैं।
डॉक्टर साब का एक और महत्वपूर्ण और यशवर्धक कार्य है- 'जिनवाणी' का संपादन।
सम्यग्ज्ञान प्रचारक मंडल, जयपुर से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'जिनवाणी' का
अक्टूबर - 1994 से निरन्तर संपादन कर रहे हैं। जैन समाज की बहुप्रचारित, सर्वसमावेशी और लोकप्रिय पत्रिका 'जिनवाणी के अनेक संग्रहणीय विशेषांक भी उनके संपादन में प्रकाशित हुए हैं उनके संपादकीय भी विद्वत्तापूर्ण तथा शोधपरक होते हैं । द्विमासिक त्रिभाषी पत्रिका 'स्वाध्याय शिक्षा' का भी उन्होंने 14 वर्षों तक संपादन किया। जैन दर्शन में कुछ सिद्धांतों को लेकर कुछ विद्वान एकपक्षीय और निश्चयात्मक व्याख्या करते हैं। डॉक्टर साब ने ऐसे दार्शनिक विषयों पर सरल भाषा में व्याख्यान देकर और लेख लिखकर भ्रम निवारण भी किया है। उन्होंने स्वाध्यायी के रूप में देश-विदेश में सेवाएँ दी हैं तो संतों भी पढाया है । उनके योगदान के हर आयाम पर स्वतंत्र लेख लिखा जा सकता है। डॉक्टर साब की सुदीर्घ, सतत और बहुआयामी सेवाओं के लिए अनेक सम्मान पुरस्कार मिले हैं। उन्हें प्राप्त पुरस्कारों की सूची बहुत लम्बी हैं, जिनमें आचार्य हस्ती स्मृति सम्मान, हेमचंद्राचार्य साहित्य सम्मान, राजस्थान संस्कृत अकादमी का अंबिकादत्त व्यास सम्मान, युवा शोध
प्रतिभा सम्मान, चंपालाल सांड साहित्य पुरस्कार, करुणा लेखक- वक्ता - प्रचारक पुरस्कार, अहिंसा इंटरनेशनल का जैन पत्रकारिता पुरस्कार, आचार्य ज्ञानसागर पुरस्कार, भैंरोदान सेठिया विद्वत्
पुरस्कार, प्रो. सागरमल प्राच्यविद्या सम्मान, पं. गिरिधर शर्मा दर्शन सम्मान इत्यादि अनेक प्रतिष्ठित सम्मान सम्मिलित हैं।
मार्च-2025 में उन्हें कोलकाता में श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन सभा के द्वारा पाँच लाख
की सम्मान - राशि के साथ 'आचार्य जवाहर जैन ज्योति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राशि की दृष्टि से किसी निजी संस्थान द्वारा प्रदत्त जैन विद्या के क्षेत्र में यह सबसे बड़ा सम्मान है। यह सम्मान पर उन्हें सामाजिक, अकादमिक आदि सभी क्षेत्रों से भरपूर बधाइयाँ मिलीं। अनुमान किया जा सकता है कि डॉक्टर साब के स्वर्गस्थ माता-पिता, श्रीमती कपूरीदेवी जैन और श्री सोभागमल जैन को भी अपने विद्वान पुत्र की उपलब्धियों पर खुशी हो रही होगी।
सितंबर-1958 में अलीगढ़ (टोंक - राजस्थान) में जन्मे जैन सेवारत्न डॉ. धर्मचंद जैन का
मार्गदर्शन विद्यार्थियों, शोधार्थियों, नवलेखकों और समाज को सदैव मिलता रहे। उनकी श्रुतसेवा का लाभ वर्ग और पंथ से परे साधारण से साधारण आदमी को भी मिले। उनके सुस्वस्थ, सुदीर्घ, सक्रिय, सेवा–साधनामय और सृजनरत जीवन की मंगलकामनाएँ।



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