जैन एकता की लहर: धर्मरक्षा के संग्राम में समाज हुआ एकजुट


विले पार्ले से मध्यप्रदेश तक उठी चेतना की गूंज, सरकार तक पहुँची आवाज

मुंबई के विले पार्ले में बीएमसी द्वारा एक प्राचीन जैन मंदिर को गिराने की कार्रवाई ने पूरे जैन समाज को झकझोर कर रख दिया। यह केवल एक संरचना का विध्वंस नहीं था, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था पर गहरा आघात था। परंतु जो सबसे उल्लेखनीय रहा, वह था समाज की प्रतिक्रिया — एकजुट, संयमित और सशक्त। जैन समाज ने मर्यादाओं के भीतर रहते हुए जिस तरह से इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि अब वह अपने धर्म, धरोहर और संतों के सम्मान के लिए संगठित होकर खड़ा है।

उसी समय मध्यप्रदेश में जैन संतों पर हुए हमले ने समाज की चेतना को और भी आंदोलित कर दिया। किन्तु यह पीड़ा आक्रोश में नहीं, बल्कि संगठन और सजगता में बदली। देशभर में प्रदर्शन हुए, ज्ञापन सौंपे गए, मीडिया के माध्यम से संतों के सम्मान की मांग उठाई गई और यह बताया गया कि संतों पर आघात केवल एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे धर्म पर प्रहार है।

इन दुखद घटनाओं के समानांतर, समाज ने महावीर जन्मकल्याणक महोत्सव और नवकार महामंत्र दिवस जैसे आयोजनों में जिस उत्साह और सहभागिता का परिचय दिया, वह प्रेरणादायक रहा। शहर-शहर शोभायात्राएं निकलीं, नवकार महामंत्र की अनुगूंज हर गली-मोहल्ले में गूंजी और जैन युवाओं से लेकर मातृशक्ति तक ने यह दिखा दिया कि अब जैन समाज केवल धर्म-केंद्रित नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति भी उत्तरदायी है।

इन सभी घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि आज का जैन समाज केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। वह सजग है, शिक्षित है और सबसे महत्वपूर्ण, संगठित है। उसकी एकता अब नारे या मंचों तक सीमित नहीं रही, वह अब सड़कों पर, समाचारों में और सरकारों की नीतियों तक पहुँची है। यह एकता न सिर्फ धर्म की रक्षा करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी यह संदेश देगी कि जब भी कोई हमारी आस्था को चुनौती देगा, हम एकजुट होकर उसका उत्तर देंगे, शांति से, परंतु दृढ़ता के साथ।

वक्त की मांग है कि यह चेतना क्षणिक न रहे। जैन समाज यदि इसी प्रकार संगठित बना रहा, तो न कोई मंदिर टूटेगा, न कोई संत पर हमला होगा और न ही हमारी विरासत पर आंच आएगी। यही एकता हमारी सबसे बड़ी ताकत है और यही हमारे धर्म की सबसे प्रभावशाली रक्षा।

दिनेश देवड़ा धोका 3D NEWS




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