जालौर किले के राई ने खोल दिए राज" JALOR FORT, SWARNGIRI FORT
जालौर का किला – वीरता, बलिदान
और ‘राई का भाव’ की कहानी
राजस्थान की धरती वीरता और बलिदान की कहानियों से भरी पड़ी है, लेकिन उनमें भी जालौर का किला अपने अभेद्य स्वरूप और गौरवशाली इतिहास के लिए विशेष स्थान रखता है। इसे "स्वर्णगिरि" या "गोल्डन माउंट" भी कहा जाता है। 13वीं शताब्दी में यह किला सोनगरा चौहान वंश के वीर शासक महाराज कान्हड़देव के अधीन था। उसी समय दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी साम्राज्य विस्तार नीति के तहत इस दुर्ग पर कब्जा करने की योजना बनाई।
1305 से 1314 तक अलाउद्दीन खिलजी ने बार-बार जालौर पर आक्रमण किया, लेकिन हर बार महाराज कान्हड़देव और उनके वीर सैनिकों ने अपने पराक्रम से उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। जालौर का किला अपने समय की सबसे मजबूत और अभेद्य किलाबंदी के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ तक कि खिलजी की विशाल सेना भी इस दुर्ग को सीधे बल प्रयोग से जीत नहीं सकी। लेकिन युद्ध में केवल शक्ति ही नहीं, छल और कूटनीति भी निर्णायक होती है – और यही छल एक ऐतिहासिक कहावत को जन्म देता है – "राई का भाव रात को बीत गया।"
एक रात, जब जालौर में सन्नाटा पसरा हुआ था, तब अलाउद्दीन खिलजी ने एक अजीब आदेश दिया – नगर में जितनी भी राई (सरसों के दाने) मिले, उन्हें मुंहमांगे दामों में खरीद लिया जाए। रातभर उसके सैनिक नगरवासियों से राई खरीदते रहे। यह देख लोग चकित थे कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में राई क्यों खरीदी जा रही है। जिनके पास जितनी राई थी, उन्होंने उसे ऊँचे दामों में बेच दिया, लेकिन किसी को इस खरीद-फरोख्त की असली वजह समझ में नहीं आई।
सुबह होते ही लोग अपनी शंका लेकर राई बेचने पहुंचे, लेकिन तब तक दरवाजे बंद हो चुके थे। उन्हें जवाब मिला – "राई का भाव तो रात को ही बीत गया।" लोग समझ नहीं पाए कि रात को इतनी कीमती मानी जाने वाली राई अब बेकार क्यों हो गई।
इस गूढ़ घटना का रहस्य तब खुला जब किले की बाहरी दीवारों और कच्चे रास्तों पर बिखेरे गए राई के दानों ने खिलजी की कुटिल योजना को उजागर कर दिया। खिलजी की सेना ने रात के अंधेरे में किले की दीवारों और आसपास के इलाके में राई के दाने बिखेर दिए थे। सुबह की ओस के कारण जहाँ-जहाँ दीवारें कमजोर थीं या रास्ते कच्चे थे, वहाँ राई के दाने अंकुरित हो गए। ये हरे-हरे अंकुर दुर्ग की उन कमजोरियों को प्रकट कर गए, जिन पर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया था।
अलाउद्दीन खिलजी ने इन कमजोरियों का लाभ उठाकर दुर्ग में प्रवेश का गुप्त मार्ग खोज लिया। जब तक महाराज कान्हड़देव को इस छल की भनक लगी, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 1311 में खिलजी ने जालौर पर अंतिम और सबसे भयंकर आक्रमण किया। इस युद्ध में महाराज कान्हड़देव और उनके वीर पुत्र वीरमदेव ने अंतिम सांस तक दुर्ग की रक्षा की। जब हार निश्चित हो गई, तब जालौर की वीरांगनाओं ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर कर लिया। हजारों की संख्या में स्त्रियों ने अग्निकुंड में समर्पित होकर अपनी मर्यादा की रक्षा की। महाराज कान्हड़देव और वीरमदेव ने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की।
इस युद्ध में यद्यपि अलाउद्दीन खिलजी ने छल से जीत प्राप्त की, लेकिन वह राजपूती आत्मसम्मान को नहीं झुका सका। जालौर का किला आज भी अपनी भव्यता के साथ खड़ा है, मानो उन वीरों की गाथा सुना रहा हो जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि की लाज बचाई।
"राई का भाव रात को बीत गया"—यह कहावत आज भी हमें सिखाती है कि समय और अवसर की पहचान करना अत्यंत आवश्यक है। जो समय पर जागरूक नहीं होते, उनके लिए अवसर हमेशा के लिए हाथ से निकल जाता है। जालौर के इस प्रसंग ने सिद्ध कर दिया कि केवल शक्ति ही नहीं, बल्कि सतर्कता और दूरदृष्टि भी विजय की कुंजी होती है।


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