सम्राट विक्रमादित्य और जैन धर्म:- डा.दिलीप धींग

 प्रकाशनार्थ : संदर्भ : भारतीय नववर्ष और विक्रम संवत् 2082 का प्रारंभ, 30 मार्च, रविवार
डॉ. दिलीप धींग (पूर्व निदेशक : अंतरराष्ट्रीय प्राकृत केन्द्र)

भारतीय काल गणना में विक्रम संवत् एक बहुप्रचलित संवत् है । भारतवर्ष के प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य ने इस संवत् का प्रवर्तन किया था। विक्रम संवत् का प्रवर्तन भगवान महावीर निर्वाण संवत् के 470 वर्ष बाद तथा ईस्वी सन् से 57 वर्ष पूर्व हुआ था। भारत में ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ शक संवत् और विक्रम संवत् का प्रयोग भी किया जाता है । नेपाल में भी सरकारी कैलेंडर के रूप में विक्रम संवत् का प्रयोग किया जाता है । यह एक चंद्र कैलेंडर है । इसमें समय के लिए चंद्रमास और नक्षत्र वर्ष का प्रयोग किया जाता है ।

अन्य अनेक संवतों के बीच विक्रम संवत् की लोकप्रियता और व्यापक स्वीकार्यता के अनेक कारण हैं। इसमें एक कारण राजा विक्रमादित्य का न्यायप्रिय, उदार और उपकारी व्यक्तित्व भी है । इतिहासकारों, विद्वानों और साहित्यकारों ने अनेक तथ्यों के आधार पर विक्रमादित्य को जैनधर्मानुयायी सम्राट् बताया है। विक्रमादित्य के व्यक्तित्व और कृतित्व में जैन धर्म के सिद्धान्त गुंफित मिलते हैं। वे उदार धार्मिक सहिष्णु सम्राट् थे ।

सम्राट विक्रमादित्य का समय वह समय था, जब भारतवर्ष में केवल श्रमण और वैदिक संस्कृतियाँ थीं। दूसरी संस्कृतियों और धर्मों का उदय या आगमन बहुत बाद में हुआ । प्रागैतिहासिक काल से ही जैन धर्म श्रमण संस्कृति का संवाहक रहा। जैन धर्म के अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर के कुछ समय पश्चात हुए भगवान बुद्ध से श्रमण संस्कृति की बौद्ध धारा प्रवाहित हुई । बुद्ध अपने आरंभिक साधनाकाल में भगवान पार्श्वनाथ की परम्परा में दीक्षित हुए थे, तत्पश्चात् उन्होंने स्वतंत्र संघ की स्थापना की ।

जैन धर्म में चारों ही वर्णों के व्यक्तियों को योग्यता के आधार पर समान सम्मान मिला। यहाँ तक भगवान महावीर की संघीय व्यवस्था में महिलाओं को भी उच्चतर और सम्मानपूर्ण स्थान मिला। मानव एकता, सामाजिक समता, स्त्री-पुरुष समानता, वैज्ञानिक तत्वज्ञान और आडम्बरविहीन साधना के फलस्वरूप विशाल भारतवर्ष में जैन धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार और विस्तार था। जैन धर्म जनधर्म के रूप में यशस्वी बना हुआ था तो राजधर्म के रूप में भी समादृत था। ऐसे कालखंड में सम्राट् विक्रमादित्य हुए।

विक्रमादित्य के नाम का शुरूआती हिस्सा 'विक्रम' उनके पराक्रम, शौर्य और साहस को इंगित करता है। नाम के पिछले हिस्से 'आदित्य' का अर्थ है- सूर्य, जो उनके यशस्वी और तेजस्वी होने का परिचायक है। जब विदेशी शकों ने उज्जयिनी (अवन्ती) पर अधिकार कर लिया,तब युवा विक्रमादित्य के पास कोई संगठित सेना नहीं थी । उन्होंने अपने पैतृक राज्य परअधिकार करने के लिये वीर मालवों की सहायता से शकों को पराजित किया । मालवों के इस सहयोग के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए विक्रमादित्य ने अवन्ती प्रदेश का नाम मालव रख दिया ।
मालवों के साथ मैत्री को अमर बनाने के लिये विक्रमादित्य ने अपने जीवन के 51वें वर्ष में मालव संवत् चलाया। विक्रमादित्य के असीम उपकार और उनकी विपुल कीर्ति के कारण वह संवत् 'विक्रम संवत्' के नाम से सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोकप्रिय हो गया । विक्रमादित्य की उज्ज्वल कीर्ति के कारण ही चन्द्रगुप्त (द्वितीय) तथा कुछ अन्य पश्चातवर्ती राजाओं ने अपने नाम के साथ 'विक्रमादित्य' की उपाधि लगाई।

विक्रमादित्य के शौर्य, सुशासन, बहुआयामी व्यक्तित्व, धर्मनिष्ठा और सद्गुणों ने सभी परम्परा के लेखकों और कवियों को आकर्षित किया। उनके जीवन के बारे में प्राकृत, संस्कृत, मरुगुर्जर, राजस्थानी और पुरानी हिन्दी में शताधिक कृतियाँ मिलती हैं। उनके जीवन के बारे में प्राप्त आधी से अधिक कृतियाँ जैन सन्तों और जैन लेखकों द्वारा लिखी हुई मिलती है। विक्रमादित्य के बारे में जैन सन्तों व जैन विद्वानों द्वारा इतने साहित्य की रचना विक्रमादित्य की न्यायप्रियता के साथ उनकी जैन धर्म के प्रति आस्था भी है। कुछ जैन पट्टावलियों में भी विक्रमादित्य के उल्लेख मिलते हैं।

हिंदी एवं अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं में भी जैन मनीषियों ने विक्रमादित्य पर काफी लिखा है। इतिहासकार अगरचंद नाहटा, गुजराती उपन्यासकार मोहनलाल चुन्नीलाल धामी, आचार्य देवेन्द्रमुनि, डॉ. सागरमल जैन, डॉ. बनारसीदास जैन आदि अनेक जैन लेखकों ने विक्रमादित्य पर लिखा । इतिहासकारों ने उनके अस्तित्व और ऐतिहासिकता को असंदिग्ध बताया है । 'जैन धर्म का मौलिक इतिहास' के दूसरे भाग में आचार्य हस्तीमलजी महाराज ने विभिन्न स्रोतों से प्राप्त प्रामाणिक सन्दर्भों से विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता सिद्ध की। उन्होंने लिखा कि विक्रमादित्य ने न सिर्फ भारतवर्ष, अपितु अन्य निकटवर्ती और सुदूरवर्ती देशों में भी मानवता की सेवा और भलाई के अनेक कार्य किये। विक्रम संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य का कालजयी व्यक्तित्व और प्रेरणास्पद कृतित्व मौजूदा शासकों और शासन प्रणालियों के लिए प्रकाशस्तंभ है।

प्राचीन जैन साहित्य में कालकाचार्य और आचार्य सिद्धसेन दिवाकर के विक्रमादित्य के साथ श्रद्धामय सम्बन्ध के उल्लेख मिलते हैं। हालांकि सिद्धसेन के कालखंड के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। जैनाचार्य के उपदेशों से प्रेरणा पाकर विक्रमादित्य ने अपने सम्पूर्ण साम्राज्य में मांसाहार, मद्यपान और प्राणियों के वध पर प्रतिबंध लगा दिया था। विक्रमादित्य ने अपने अंतिम समय में पंच परमेष्ठी (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु) की शरण लेकर महाप्रयाण किया। दिसम्बर-2016 में भारतीय डाक विभाग ने सम्राट् विक्रमादित्य पर पाँच रुपये मूल्यवर्ग का बहुरंगी स्मारक डाक टिकट जारी किया ।

7. अय्या मुदली स्ट्रीट,
साहुकारपेट, चेन्नई-600001


संलग्न : विक्रमादित्य पर जारी डाक टिकट की छवि




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