*दोहे (अंतरिक्षपरी सुनीता विलियम्स)*:-चिराग़ जैन 'चैतन्य'
अंतरिक्ष से लौटकर, आई जब विलियम्स।
सब अपनों ने अप किये, अपने-अपने थम्स।।१।।
सुनी सुनीता की कथा, गाया उसका गाथ।
करने को सैल्यूट फिर, गया माथ पर हाथ।।२।।
ऊपर उठ सब पंथ से, चली स्वयं के पंथ।
परी गगन की वह बनी, विचरण कर नौ मंथ।।३।।
नारी तू नारायणी, सुनते थे जो कथ्य।
सुता सुनीता ने इसे, बना दिया फिर तथ्य।।४।।
सिर्फ शेर करते नहीं, पूरी सारी आस।
शेरनियाँ भी कम नहीं, करा दिया अहसास।।५।।
दुनिया को हतप्रभ किया, जीता फिर विश्वास।
स्वर्ण अक्षरों में किया, अंकित नव इतिहास।।६।।
चिराग़ जैन 'चैतन्य' ✍️



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