"अल्फ़ाज़ से परे एक रिश्ता":- दिनेश दोशी चेन्नई
आधी पौनी हकीकत आधी पाव फसाना
बन जाए गर हकीकत तो आला है नज़राना
मेरी कमियों को वो कुछ इस कदर छुपा लेती थी,जैसे लिहाफ़ पे ग़िलाफ
बेपनाह मोहब्बत करता था मैं भी उससे,उसका करती थी लिहाज़
कैसे करूं उसके दिली,अंदरूनी प्यार का ज़िक्र
करती थी हर लम्हा मेरी फ़िक्र,पर कभी न जुबां पे ज़िक्र
मेरे हर एब पर डालती थी पर्दा, कभी न किया मुझे बेपर्दा
समंदर सा गहरा है उसका प्यार, आसमां के भी उस पार
कभी ना टोका कभी रोका,उसे भरोसा था अपने प्यार पर बेपार
पता था उसे कभी न करूंगा,उसके साथ बेवफाई
लिहाज़ा वो चाहती रही,जिंदगी भर मुझे बेइंतहाई
निहाल है नसीब मेरा ऐसी संगिनी पाकर,सबको मिले ऐसी ही परछाई
मुझे फख्र है उसकी शोहरदारी पर,ज़विंदा रहे उसकी अच्छाई
✒️दिनेश दोशी
काश हर किसी की ज़िंदगी में ये हकीकत होती तो सबकी ज़िंदगी जन्नत होती

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