बैंक ट्रांजेक्शन पर बढ़ते चार्ज: उपभोक्ताओं के साथ अन्याय
सरकार डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने की बात करती है, लेकिन जब लोग अपने ही खातों से पैसे निकालते या ट्रांसफर करते हैं, तो उन पर तरह-तरह के शुल्क लगाए जाते हैं। यह नीति आम नागरिकों के लिए किसी अन्याय से कम नहीं है। एक व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई पर पहले ही कई तरह के टैक्स चुकाता है, फिर अपनी ही बचत को उपयोग करने के लिए शुल्क देना कितना न्यायोचित है?
बैंकों द्वारा अलग-अलग सेवाओं पर शुल्क लगाना अब आम बात हो गई है। एटीएम से निशुल्क निकासी की सीमाएं तय कर दी गई हैं, ऑनलाइन ट्रांजेक्शन पर शुल्क लगाया जा रहा है, न्यूनतम बैलेंस न रखने पर पेनल्टी लगाई जा रही है, और कई डिजिटल बैंकिंग सेवाओं पर भी शुल्क लगाने की तैयारी हो रही है। यह सब आम ग्राहकों की जेब पर सीधा असर डालता है। सरकार चाहती है कि लोग डिजिटल भुगतान को अपनाएं, लेकिन जब ऑनलाइन ट्रांजेक्शन महंगा पड़ेगा, तो लोग नकद लेन-देन की ओर लौटने पर मजबूर होंगे।
बैंक उपभोक्ताओं से बचत खाते में जमा राशि पर बेहद कम ब्याज देते हैं, लेकिन उन्हीं पैसों से बड़े उद्योगपतियों को सस्ते दरों पर लोन देते हैं। इसके बावजूद जब आम आदमी अपने पैसे का इस्तेमाल करना चाहता है, तो उस पर अतिरिक्त चार्ज लगाया जाता है। यह नीति दोहरे मापदंड को दर्शाती है।
सरकार को इस मामले पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए और बैंकों को अनावश्यक चार्ज लगाने से रोकना चाहिए। डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए लेन-देन शुल्क को समाप्त करना चाहिए, ताकि आम उपभोक्ता बिना किसी अतिरिक्त बोझ के बैंकिंग सुविधाओं का लाभ उठा सके। अगर बैंकिंग चार्ज इसी तरह बढ़ते रहे, तो डिजिटल इंडिया का सपना अधूरा रह जाएगा और आम जनता के लिए बैंकिंग सुविधाएं बोझ बन जाएंगी।


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