शिक्षा का स्तर और शिक्षकों का अविश्वास

 

शिक्षक ज्ञान का दीपक जलाने वाला होता है, समाज को दिशा देने वाला होता है। लेकिन जब वही शिक्षक अपने ही बनाए विद्यालयों से मुँह मोड़ ले, तो सवाल उठता है—आखिर बात क्या है? यह दृश्य कुछ ऐसा है जैसे कोई हलवाई अपनी ही दुकान की मिठाईयों को देखे जरूर, पर खुद खाने से घबराए। जैसे कोई डॉक्टर रोज़ मरीजों का इलाज करे, पर अपने परिवार का इलाज खुद के अस्पताल में करवाने से कतराए। जब कोई पुल बनाने वाला इंजीनियर उस पुल से गुजरने से डरने लगे, तो समझ जाइए कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है।

विद्यालयों की बड़ी-बड़ी दीवारों पर ‘उत्तम शिक्षा’, ‘भविष्य निर्माण’, ‘आधुनिक तकनीक से शिक्षण’ जैसे चमकदार वाक्य लिखे मिलते हैं। स्कूल प्रबंधन बच्चों के अभिभावकों को यह समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ता कि उनका विद्यालय शिक्षा का मंदिर है, जहाँ भविष्य सँवारा जाता है। लेकिन जरा अंदर झाँकिए, तो देखेंगे कि खुद शिक्षक अपने बच्चों को इस ‘भविष्य निर्माण’ की प्रयोगशाला का हिस्सा बनाने को तैयार नहीं। वे दूसरों के बच्चों को पढ़ाते जरूर हैं, मगर अपने बच्चों को किसी और विद्यालय में भर्ती करवाने के लिए खूब भागदौड़ करते हैं। सवाल उठता है कि जब शिक्षा देने वाला ही अपनी शिक्षा पर भरोसा नहीं कर रहा, तो क्या वह सच में शिक्षा है या सिर्फ एक दिखावा?

शिक्षक जानते हैं कि विद्यालय अब शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि व्यापारिक संस्थान बन चुके हैं। यहाँ ज्ञान से ज़्यादा फीस की चर्चा होती है, पढ़ाई से ज़्यादा परीक्षा के नतीजे मायने रखते हैं, और नैतिकता से ज़्यादा मार्केटिंग पर जोर दिया जाता है। शिक्षकों पर पढ़ाने से ज़्यादा रिपोर्ट बनाने, आदेशों का पालन करने और प्रशासनिक कामों का बोझ होता है। जब कक्षाओं में बच्चों से ज़्यादा फ़ॉर्म भरे जा रहे हों, जब किताबों से ज़्यादा ‘स्मार्ट क्लास’ की ब्रांडिंग हो रही हो, तो क्या शिक्षक यह नहीं समझते कि यहाँ असली शिक्षा की बजाय सिर्फ एक दिखावटी व्यवस्था चल रही है? वे इसे जानते हैं, इसलिए अपने बच्चों को इस व्यवस्था से बचाने के लिए वे किसी और स्कूल का रुख कर लेते हैं।

सोचिए, अगर डॉक्टर अपने अस्पताल की दवाओं पर भरोसा न करे, हलवाई अपनी मिठाई न खाए, तो क्या आप वहाँ इलाज करवाना चाहेंगे या मिठाई खरीदना चाहेंगे? ठीक वैसे ही, जब शिक्षक अपने ही विद्यालयों पर भरोसा नहीं कर पा रहे, तो अभिभावकों से उस शिक्षा पर विश्वास करने की उम्मीद कैसे की जाए?

इसलिए अगली बार जब कोई शिक्षक अपने विद्यालय की महानता के गीत गाए, तो बस एक सरल सा प्रश्न पूछिए "गुरु जी, आपके बच्चे कहाँ पढ़ते हैं?" जवाब भले ही शब्दों में न मिले, पर चेहरे के हाव-भाव सच्चाई खुद बयां कर देंगे!



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