शहीद दिवस पर कविता :- कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव



 *शहीद दिवस*

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सुखदेव,भगतसिंह,राजगुरु, ये तीन नहीं, तीन सौ पर भारी थे।

वो सच्चे देशभक्त राष्ट्र प्रेमी,वो पक्के क्रांतिकारी थे।


कहते थे भगतसिंह शान से,

जीने की इच्छा है मुझमें,मै छिपाना नहीं चाहता।

मेरा जीवन देश को अर्पण, जताना नहीं चाहता।

नहीं लालच फांँसी से बचने का, नहीं मौत से डरने का।

मौका सुनहरा आज ही मिला,वतन खातिर कुछ करने का।

मत लटकाओं हमको फांँसी पर, भले उड़ा दो हमको गोली से।

ललकार किया भगतसिंह ने गवर्नर से, इंकलाब जिंदाबाद की बोली से।


हम हिन्द के क्रांतिकारी है,हमे चाहिए आजादी,

हम राजनीतिक बंदी है, कोई गुनहगार नहीं।

हम अपनी धुन के पक्के हैं, हमने कसमें खाई हैं,

बदला लेना स्कोट से,और किसी से कोई सरोकार नहीं।


जुलूस था हमारा शांतिप्रिय, साइमन कमीशन के विरोध में,

पंजाब पुलिस के सुपरिटेंडेंट ने लाठीचार्ज करा दिया।

नेता हमारे लाजपतराय को बुरी तरह घायल किया,

18 दिन इलाज चला पर मौत ने उनको हरा दिया।

 

स्कोट के बदले भूल से गोली सान्डर्स पर चलाई है।

सान्डर्स हत्या केस में हमें फांँसी की सजा सुनाई है।

कोई गम नहीं है हमको हंँसते हंँसते फांँसी खायेंगे।

मरते मरते भी हम गीत आजाद हो हिन्द के गायेंगे।


फांँसी के तख्ते पर भी जा बोले,

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,

इंकलाब जिन्दाबाद, इंकलाब जिन्दाबाद।

हिन्दुस्तान आजाद हो इंकलाब जिन्दाबाद।


आज शहीद दिवस पर नमन उन्हें हम करते हैं।

याद में उनकी मुथा एक दीप प्रज्ज्वलित करते है।

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*कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव*,

*मुम्बई*

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