परिसीमन 2026: लोकसभा सीटों का गणित और उत्तर-दक्षिण का सियासी संतुलन
नई दिल्ली: भारत में 2026 में संभावित परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। उत्तर भारतीय राज्यों को इससे बड़ा फायदा होता दिख रहा है, जबकि दक्षिण भारतीय दल इसे सत्ता संतुलन के लिए खतरा मान रहे हैं। जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्गठन किया गया तो लोकसभा में उत्तर भारत की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी और दक्षिण भारत की अपेक्षाकृत कम हो जाएगी।
देश में आखिरी परिसीमन 2002 में हुआ था, लेकिन तब लोकसभा की सीटों में कोई बदलाव नहीं किया गया था। 2001 की जनगणना के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे 2026 तक टाल दिया था। अब समय नजदीक है और मोदी सरकार इसे लागू करने की तैयारी में है। चर्चा है कि 20 लाख की आबादी पर एक लोकसभा सीट तय की जाएगी, जिससे मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़कर 753 हो जाएगी।
अगर ऐसा हुआ, तो उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 128, बिहार की 40 से 70, मध्य प्रदेश की 29 से 47 और राजस्थान की 25 से 44 हो सकती हैं। वहीं, दक्षिण भारतीय राज्यों में अपेक्षाकृत कम वृद्धि होगी। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने आशंका जताई है कि उनके राज्य की लोकसभा सीटें 8 कम हो सकती हैं। इससे दक्षिण भारत के दलों को यह डर सता रहा है कि उनकी राजनीतिक शक्ति घट सकती है।
1971 की जनगणना के आधार पर 1976 में परिसीमन होना था, लेकिन इंदिरा गांधी सरकार ने इसे 25 साल के लिए टाल दिया। अब, जब 2026 में यह प्रक्रिया पूरी होनी है, तो इसके प्रभाव को लेकर विरोध और समर्थन दोनों सामने आ रहे हैं। दक्षिण भारतीय राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के लिए बेहतर प्रयास किए, और अब अगर सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया तो वे नुकसान में रहेंगे।
दूसरी ओर, उत्तर भारतीय राज्य इसे संसदीय प्रतिनिधित्व का संतुलन बताते हुए समर्थन कर रहे हैं। यदि परिसीमन नए प्रस्ताव के अनुसार होता है, तो दक्षिण भारत की सीटें 129 से बढ़कर 144 हो जाएंगी, लेकिन कुल प्रतिशत के हिसाब से यह 24% से घटकर 19% रह जाएगा। यही कारण है कि दक्षिण के दलों में इस पर आपत्ति है।
मोदी सरकार के इस फैसले को लेकर विपक्षी दल इसे राजनीतिक हथकंडा बता सकते हैं, जबकि सरकार इसे आवश्यक संवैधानिक सुधार के रूप में पेश कर सकती है। संभावित समाधान के तौर पर राज्यसभा में दक्षिण के राज्यों का प्रभाव बढ़ाने, विकास स्तर के आधार पर सीटें तय करने या फिर कोई संवैधानिक गारंटी देने जैसे विकल्पों पर चर्चा हो सकती है।
फिलहाल, इस मसले पर राजनीति गर्माने वाली है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इसे किस तरह आगे बढ़ाती है और क्या वह सभी दलों को संतुष्ट करने में सफल होती है या नहीं।
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