संप्रदाय से नहीं, जैन धर्म से हो हमारी पहचान #JAIN #JAINISM

 संप्रदाय नहीं जैनत्व  प्राथमिकता हो





जैन समुदाय में एकता और सद्भाव की भावना सदैव से रही है। जैन धर्म अपनी अहिंसा, करुणा और सत्य के सिद्धांतों के लिए विश्वभर में जाना जाता है। यह धर्म न केवल आत्मशुद्धि और मोक्ष का मार्ग दिखाता है, बल्कि समाज में प्रेम और एकता का भी संदेश देता है। समय के साथ, जैन धर्म विभिन्न संप्रदायों में विभाजित हुआ, जिनमें श्वेतांबर, दिगंबर, स्थानकवासी, तेरापंथी आदि प्रमुख हैं। इन सभी संप्रदायों की अपनी परंपराएँ, रीति-रिवाज और धार्मिक दृष्टिकोण हो सकते हैं, लेकिन इनका मूल आधार एक ही है—अहिंसा, अनेकांतवाद और अपरिग्रह।



वर्तमान समय में यह देखा गया है कि विभिन्न जैन संप्रदायों के विचारक, साधु-साध्वी, तथा साहित्यकार कभी-कभी अपने विचारों को स्थापित करने के प्रयास में अन्य संप्रदायों की आलोचना कर देते हैं। इससे श्रावकों के मन में द्वेष और असहमति की भावना जन्म ले सकती है। किन्तु हमें यह समझना चाहिए कि जैन धर्म का मूल तत्व अनेकांतवाद है, जो हमें सिखाता है कि सत्य के विभिन्न पक्ष हो सकते हैं। भगवान महावीर ने अनेकांतवाद का संदेश दिया था, जिसका अर्थ है कि सत्य एक ही हो सकता है, लेकिन उसे देखने के दृष्टिकोण अलग-अलग हो सकते हैं। यदि हम इस सिद्धांत को आत्मसात करें, तो हम यह समझ पाएँगे कि सभी संप्रदाय अपने-अपने तरीके से मोक्षमार्ग पर चल रहे हैं। एक-दूसरे की मान्यताओं का सम्मान करना और अपने विचारों को दूसरों पर थोपने से बचना ही सच्चा जैनत्व है।



मूर्तिपूजा को लेकर जैन धर्म में भिन्न विचारधाराएँ हैं। श्वेतांबर मूर्तिपूजक संप्रदाय में भगवान की प्रतिमा की पूजा की जाती है, जबकि स्थानकवासी और तेरापंथ संप्रदाय इसमें विश्वास नहीं रखते और ध्यान एवं आत्मशुद्धि को प्राथमिकता देते हैं। इसी प्रकार, दिगंबर संप्रदाय में साधु पूर्णत: निर्वस्त्र रहते हैं और प्रतिमाओं के माध्यम से ध्यान साधना करते हैं। सभी संप्रदायों का उद्देश्य आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्त करना है, बस उनके मार्ग अलग-अलग हैं। इसी तरह, मुहपत्ति का उपयोग भी भिन्न प्रकार से किया जाता है। स्थानकवासी और तेरापंथी संप्रदाय में साधु-साध्वी मुहपत्ति को मुख पर बांधते हैं, जबकि अन्य संप्रदायों में इसे हाथ में रखने की परंपरा है। मुहपत्ति का उद्देश्य वाणी का संयम और सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना है। यह एक व्यक्ति के आध्यात्मिक अभ्यास और संप्रदाय की परंपरा पर निर्भर करता है।



हर जैन संप्रदाय ने जैन धर्म के प्रचार और समाज कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। श्वेतांबर मूर्तिपूजक संप्रदाय ने भव्य मंदिरों का निर्माण कर धर्म की व्यापकता को बनाए रखा। दिगंबर संप्रदाय ने कठोर तप और साधना द्वारा जैन धर्म के मूल सिद्धांतों को जीवंत रखा। स्थानकवासी संप्रदाय ने साधना और ध्यान पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। तेरापंथ संप्रदाय ने अनुशासन, अहिंसा यात्रा और समाज सुधार के कार्यों को आगे बढ़ाया। अगर सभी संप्रदाय एकजुट होकर कार्य करें, तो जैन धर्म को और अधिक ऊँचाइयों पर ले जा सकते हैं। संप्रदायों के मतभेद गौण हैं, लेकिन हमारा धर्म महान है। हमें अपनी अगली पीढ़ी को यह सिखाना होगा कि सभी जैन संप्रदायों का एक ही लक्ष्य है—मोक्ष प्राप्ति।



एक-दूसरे के विचारों और परंपराओं का सम्मान करना चाहिए। जैन संत और साधु-साध्वी अपने-अपने संप्रदाय में धर्म की सेवा कर रहे हैं, हमें उनके प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए। सभी को धार्मिक चर्चाओं में सकारात्मकता बनाए रखनी चाहिए और किसी भी प्रकार की नकारात्मकता से बचना चाहिए। युवाओं को जैन धर्म के मूल सिद्धांतों से जोड़ने पर ध्यान देना चाहिए, न कि संप्रदायों के मतभेदों पर। जैन धर्म हमें संयम, सहिष्णुता और करुणा सिखाता है। यदि सभी परस्पर प्रेम और एकता की भावना रखें, तो संप्रदायों के बीच के मतभेद कभी भी हमें विभाजित नहीं कर सकते। सभी मिलकर जैन धर्म की महान परंपरा को एक नई दिशा दें और पूरे समाज में सद्भाव और शांति का संदेश फैलाएँ।


हाल ही में गुजरात के गृहमंत्री हर्ष संघवी ने भी एक मंच से कहा था कि "अपने-अपने संप्रदाय की जिन क्रियाओं को करना है उपाश्रय मे करें, आपकी जिस पर भी आस्था है करें, पर बाहर आकर सिर्फ जैन बनकर रहें। किसी भी संप्रदाय की भावनाओं को आहत न करें और जैन एकता बढ़ाएँ।" उनके इन शब्दों में जैन धर्म की मूल भावना झलकती है—जहाँ विविधता में एकता और परस्पर सम्मान ही सच्ची धर्मपरायणता है।

   दिनेश देवड़ा धोका       

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