आधुनिक रिश्ते: अपेक्षाओं की उलझन

 चिंता की चक्की में पिसते माता-पिता



दिनेश देवड़ा धोका

आज के दौर में माता-पिता की चिंताओं की सूची दिन-ब-दिन लंबी होती जा रही है। पहले जहाँ बच्चों की परवरिश और उनकी शिक्षा ही प्रमुख चिंताएँ होती थीं, वहीं अब उनकी समय पर शादी होना एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है। बच्चों की बढ़ती ख्वाहिशें और उनके रिश्तों के लिए अनगिनत मांगें, माता-पिता को दिन-रात व्यस्त रखती हैं। समय पर शादी न होने की चिंता माता-पिता के लिए सबसे बड़ी होती है। समाज के दबाव में वे हमेशा इस चिंता में रहते हैं कि कब और कैसे उनके बच्चों के अच्छे रिश्ते आएंगे। रिश्तों की तलाश में वे बिचौलियों, इंटरनेट साइट्स और रिश्तेदारों के माध्यम से तरह-तरह के प्रयास करते हैं। मगर, आजकल लड़के और लड़कियाँ भी अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर निर्णय लेते हैं। रिश्तों के लिए उनकी मांगें भी बढ़ गई हैं। लड़कियों को अब अच्छा-खासा कमाने वाला लड़का चाहिए जो खुद का मकान और बड़ी आय रखता हो। वहीं लड़के भी अच्छी पढ़ी-लिखी, स्वतंत्र और छोटे परिवार की लड़की की तलाश में रहते हैं। इन मांगों ने रिश्तों को एक व्यापार की तरह बना दिया है, जिसमें हर कोई अपने हिस्से की सौदेबाजी कर रहा है। शादी के बाद खुद का मकान और बड़े शहर में बसने की इच्छा भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। माता-पिता अपने बच्चों की इन ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए अपनी सारी जमापूंजी लगाने को तैयार रहते हैं। खुद का मकान होना अब न केवल एक आवश्यकता है, बल्कि एक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक भी बन गया है। बड़ी आय और बड़े शहर में रहने की इच्छा ने पारिवारिक संबंधों को भी प्रभावित किया है। छोटे परिवार की चाहत में संयुक्त परिवार की अवधारणा कहीं खो सी गई है। माता-पिता बच्चों को बेहतर भविष्य देने के चक्कर में अपनी सेहत और खुशियों को भूल जाते हैं। इस प्रकार, माता-पिता की चिंताओं की यह अनवरत यात्रा आज के समाज का कड़वा सच है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वास्तव में यह चिंताएँ जरूरी हैं या हम इन्हें खुद ही बढ़ा-चढ़ाकर अपनी जिंदगी को कठिन बना रहे हैं? सभी इस चिंतन मे है की हमे इन परिस्तिथिओ मे क्या निर्णय ले ताकि हमारी और उनकी जिंदगी थोड़ी सरल और सुकूनभरी हो सके।


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टिप्पणियाँ

  1. बिल्कुल ठीक सटीक बात कही आपने आज के समाज पर
    मां-बाप की दशा व बच्चों की बदलती दिशा पर आपका समुचित अवलोकन

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